भगवद-दर्शन का नियम है कि सबसे पहिले श्रीचरण-कमलों के दर्शन करते हुए क्रमश: ऊपर की ओर देखते हुए अंत में श्रीमुख का दर्शन करने के उपरान्त पुन: पूर्ण-दर्शन किये जायें। परन्तु यह सदैव संभव भी नहीं हो पाता, वह होने ही नहीं देते। कौतुकप्रिय जो ठहरे ! सब कुछ बिना कौतुक करने दे तो उसके नाम को बट्टा लगता है।
आज श्रीबांकेबिहारीजी ने अपनी अहैतुकी कृपा के फ़लस्वरुप अपने दर्शन के लिये दास को प्रेरणा दी और दास पहुँच गया, उनकी कृपा से खिंचा-खिंचा। रविवार के कारण भारी जनसमुदाय। सब अपने प्रिय की एक झलक पाने को आतुर ! तुमुल-जयघोष ! जनसमुदाय धीरे-धीरे अपनी शक्ति के द्वारा दास को स्वत: ही बिहारीजी के दर्शन के लिये आगे बढ़ाने लगा। चारों ओर मुण्ड ही मुण्ड। कुछ अधिक लंबे भक्तों के आगे खड़े रहने के कारण, दर्शन को लालायित इन अँखियों को चरण-दर्शन तो कहाँ संभव थे [श्रीबांकेबिहारीजी के चरण-दर्शन वर्ष में एक ही बार होते हैं, सो चरण-दर्शन तो होने ही न थे] हाँ, प्रथम-दर्शन में श्रीमुख का ही दर्शन हुआ और उन अनियारे नयनों में जाकर नैन अटक कर ही तो रह गये ! मोहन ! मोहन का सम्मोहन ! उनके सम्मोहन से बचना है तो नैन न मिलाना ! किन्तु यदि मिल गये तो फ़िर "अपना" कुछ नहीं रहेगा ! सामने खड़े हैं और नैनों से नैन मिल गये हैं ; गोस्वामीओं द्वारा कुछ-कुछ क्षणों के अंतराल में किया जाने वाला "पर्दा" ही इसमें व्यवधान बनता है और इन्ही क्षणों में पलक झपकाने का भी समय मिल जाता है और देह-स्मृति हो उठती है। देह-स्मृति और देह-विस्मृति ! कौन जाने, उन्होंने कैसा श्रंगार किया है ? कौन सी पोशाक पहनी है ? केश-राशि कैसी है, मुकुट कैसा है ? कौन से रत्न-जड़ित आभूषन पहने हैं ? कैसी माला धारण करे हैं ?
नैनों में नैन फ़ँसकर रह गये हैं, वे देखें तो क्या ? वह नैनों को कोई छूट ही नहीं देते ! देह मानो द्रव-रुप में विगलित हो रही है और वह द्रव खिंचा जा रहा है, उन अनियारे नयनों में ! कौन किसे देख रहा है ? कौन जाने ? नेत्रों का होना सफ़ल हो रहा है, जब तक वे उन अनियारे नयनों में उलझे हैं तब तक ! संभवत: वे भी नहीं चाहते कि इन नेत्रों से उनके अतिरिक्त और भी कुछ देखा जाये ! तो फ़िर ऐसा ही कर दो ना ! मैंने कब चाहा कि और कुछ देखूँ ? जो तुम्हें प्रिय हो, केवल वह ही देखूँ !
आज श्रीबांकेबिहारीजी ने अपनी अहैतुकी कृपा के फ़लस्वरुप अपने दर्शन के लिये दास को प्रेरणा दी और दास पहुँच गया, उनकी कृपा से खिंचा-खिंचा। रविवार के कारण भारी जनसमुदाय। सब अपने प्रिय की एक झलक पाने को आतुर ! तुमुल-जयघोष ! जनसमुदाय धीरे-धीरे अपनी शक्ति के द्वारा दास को स्वत: ही बिहारीजी के दर्शन के लिये आगे बढ़ाने लगा। चारों ओर मुण्ड ही मुण्ड। कुछ अधिक लंबे भक्तों के आगे खड़े रहने के कारण, दर्शन को लालायित इन अँखियों को चरण-दर्शन तो कहाँ संभव थे [श्रीबांकेबिहारीजी के चरण-दर्शन वर्ष में एक ही बार होते हैं, सो चरण-दर्शन तो होने ही न थे] हाँ, प्रथम-दर्शन में श्रीमुख का ही दर्शन हुआ और उन अनियारे नयनों में जाकर नैन अटक कर ही तो रह गये ! मोहन ! मोहन का सम्मोहन ! उनके सम्मोहन से बचना है तो नैन न मिलाना ! किन्तु यदि मिल गये तो फ़िर "अपना" कुछ नहीं रहेगा ! सामने खड़े हैं और नैनों से नैन मिल गये हैं ; गोस्वामीओं द्वारा कुछ-कुछ क्षणों के अंतराल में किया जाने वाला "पर्दा" ही इसमें व्यवधान बनता है और इन्ही क्षणों में पलक झपकाने का भी समय मिल जाता है और देह-स्मृति हो उठती है। देह-स्मृति और देह-विस्मृति ! कौन जाने, उन्होंने कैसा श्रंगार किया है ? कौन सी पोशाक पहनी है ? केश-राशि कैसी है, मुकुट कैसा है ? कौन से रत्न-जड़ित आभूषन पहने हैं ? कैसी माला धारण करे हैं ?
नैनों में नैन फ़ँसकर रह गये हैं, वे देखें तो क्या ? वह नैनों को कोई छूट ही नहीं देते ! देह मानो द्रव-रुप में विगलित हो रही है और वह द्रव खिंचा जा रहा है, उन अनियारे नयनों में ! कौन किसे देख रहा है ? कौन जाने ? नेत्रों का होना सफ़ल हो रहा है, जब तक वे उन अनियारे नयनों में उलझे हैं तब तक ! संभवत: वे भी नहीं चाहते कि इन नेत्रों से उनके अतिरिक्त और भी कुछ देखा जाये ! तो फ़िर ऐसा ही कर दो ना ! मैंने कब चाहा कि और कुछ देखूँ ? जो तुम्हें प्रिय हो, केवल वह ही देखूँ !
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