तुमने क्या सोचा कि मैं इस बात से अनभिज्ञ हूँ कि जब भी दास पर कोई दु:ख/ विपत्ति आती है तो तुम स्वयं कितने उदास हो जाते हो। तुम्हारे मुख पर सदैव व्याप्त रहने वाली वह मनमोहिनी मुस्कान कहाँ अन्तर्ध्यान हो जाती है। तुम्हारा एक नियम तो अटल है कि प्रारब्ध-दोष तो भोगने ही होंगे परन्तु क्या मैं नहीं जानता कि उन्हें भोगते समय तुम मुझे अपने अंक में बैठा लेते हो ताकि उनका विशेष प्रभाव दास पर न पड़े और कभी-कभी तो स्वयं को ही प्रस्तुत कर देते हो। प्रारब्ध-दोष तो भोगने ही होंगे; किसने नहीं भोगे परन्तु तुम अपने प्रियजनों के प्रारब्ध-दोषों के भोगों को भी, अपने प्रियजनों के साथ रहकर इतना सरल कर देते हो कि उस समय भी तुम्हारे सानिध्य का आनन्द ही प्राप्त होता है। तुम्हारा ही हूँ सो तुम्हारी ही कृपा से तुम्हारे कई गुणों से परिचित भी हूँ। तुम्हारे श्रीयुगलचरणों का सानिध्य इस दास को निरन्तर मिलता रहे; हे श्यामा-श्याम, तुम मुझे इस योग्य बना दो। जैसा भी हूँ, तुम्हारा ही हूँ।
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