जब हम हिंदू धर्म के इतिहास ग्रंथ पढ़ते हैं
तो ऋषि-मुनियों की परम्परा के पूर्व मनुओं
की परम्परा का उल्लेख मिलता है जिन्हें जैन धर्म
में कुलकर कहा गया है। ऐसे क्रमश: 14 मनु माने गए हैं
जिन्होंने समाज को सभ्य और तकनीकी सम्पन्न
बनाने के लिए अथक प्रयास किए। धरती के प्रथम
मानव का नाम स्वायंभव मनु था और
प्रथम स्त्री थी शतरूपा।
पुराणों में हिंदू इतिहास की शुरुआत
सृष्टि उत्पत्ति से ही मानी जाती है,
ऐसा कहना की यहाँ से शुरुआत हुई यह शायद
उचित न होगा फिर भी वेद-पुराणों में मनु (प्रथम
मानव) से और भगवान कृष्ण की पीढ़ी तक
का इसमें उल्लेख मिलता है।- जानिए हिन्दू धर्म को-2
हिन्दू धर्म की मुख्य बातें
किसी भी धर्म के मूल तत्त्व उस धर्म को मानने
वालों के विचार, मान्यताएँ, आचार
तथा संसार एवं लोगों के प्रति उनके दृष्टिकोण
को ढालते हैं। हिंदू धर्म की बुनियादी पाँच
बातें तो है ही, (1.वंदना, 2.वेदपाठ, 3.व्रत,
4.तीर्थ, और 5.दान) लेकिन इसके
अलावा निम्न सिद्धांत को भी जानें:-
1. ब्रह्म ही सत्य है: ईश्वर एक ही है और
वही प्रार्थनीय तथा पूजनीय है। वही सृष्टा है
वही सृष्टि भी। शिव, राम, कृष्ण आदि सभी उस
ईश्वर के संदेश वाहक है। हजारों देवी-
देवता उसी एक के प्रति नमन हैं। वेद, वेदांत और
उपनिषद एक ही परमतत्व को मानते हैं।
2. वेद ही धर्म ग्रंथ है : कितने लोग हैं जिन्होंने वेद
पढ़े? सभी ने पुराणों की कथाएँ जरूर सुनी और उन
पर ही विश्वास किया तथा उन्हीं के आधार पर
अपना जीवन जिया और कर्मकांड किए। पुराण,
रामायण और महाभारत धर्मग्रंथ नहीं इतिहास
ग्रंथ हैं। ऋषियों द्वारा पवित्र ग्रंथों, चार वेद
एवं अन्य वैदिक साहित्य की दिव्यता एवं
अचूकता पर जो श्रद्धा रखता है वही सनातन धर्म
की सुदृढ़ नींव को बनाए रखता है।
3. सृष्टि उत्पत्ति व प्रलय : सनातन हिन्दू धर्म
की मान्यता है कि सृष्टि उत्पत्ति, पालन एवं
प्रलय की अनंत प्रक्रिया पर चलती है। गीता में
कहा गया है कि जब ब्रह्मा का दिन उदय
होता है, तब सब कुछ अदृश्य से दृश्यमान
हो जाता है और जैसे ही रात होने लगती है, सब
कुछ वापस आकर अदृश्य में लीन हो जाता है। वह
सृष्टि पंच कोष तथा आठ तत्वों से मिलकर
बनी है। परमेश्वर सबसे बढ़कर है।
4. कर्मवान बनो : सनातन हिन्दू धर्म भाग्य से
ज्यादा कर्म पर विश्वास रखता है। कर्म से
ही भाग्य का निर्माण होता है। कर्म एवं
कार्य-कारण के सिद्धांत अनुसार प्रत्येक
व्यक्ति अपने भविष्य के लिए पूर्ण रूप से स्वयं
ही उत्तरदायी है। प्रत्येक व्यक्ति अपने मन, वचन
एवं कर्म की क्रिया से अपनी नियति स्वयं तय
करता है। इसी से प्रारब्ध बनता है। कर्म
का विवेचन वेद और गीता में दिया गया है।
5. पुनर्जन्म : सनातन हिन्दू धर्म पुनर्जन्म में
विश्वास रखता है। जन्म एवं मृत्यु के निरंतर
पुनरावर्तन की प्रक्रिया से गुजरती हुई
आत्मा अपने पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर
धारण करती है। आत्मा के मोक्ष प्राप्त करने से
ही यह चक्र समाप्त होता है।
6. प्रकति की प्रार्थना : वेद प्राकृतिक
तत्वों की प्रार्थना किए जाने के रहस्य
को बताते हैं। ये नदी, पहाड़, समुद्र, बादल,
अग्नि, जल, वायु, आकाश और हरे-भरे प्यारे वृक्ष
हमारी कामनाओं की पूर्ति करने वाले हैं अत:
इनके प्रति कृतज्ञता के भाव हमारे जीवन
को समृद्ध कर हमें सद्गति प्रदान करते हैं।
इनकी पूजा नहीं प्रार्थना की जाती है। यह
ईश्वर और हमारे बीच सेतु का कार्य करते हैं।
यही दुख मिटाकर सुख का सृजन करते हैं।
7. गुरु का महत्व : सनातन धर्म में सद्गुरु के समक्ष वेद
शिक्षा-दिक्षा लेने का महत्व है।
किसी भी सनातनी के लिए एक गुरु
(आध्यात्मिक शिक्षक) का मार्ग दर्शन आवश्यक
है। गुरु की शरण में गए बिना अध्यात्म व जीवन के
मार्ग पर आगे बढ़ना असंभव है। लेकिन वेद यह
भी कहते हैं कि अपना मार्ग स्वयं चुनों।
जो हिम्मतवर है वही अकेले चलने की ताकत रखते
हैं।
तो ऋषि-मुनियों की परम्परा के पूर्व मनुओं
की परम्परा का उल्लेख मिलता है जिन्हें जैन धर्म
में कुलकर कहा गया है। ऐसे क्रमश: 14 मनु माने गए हैं
जिन्होंने समाज को सभ्य और तकनीकी सम्पन्न
बनाने के लिए अथक प्रयास किए। धरती के प्रथम
मानव का नाम स्वायंभव मनु था और
प्रथम स्त्री थी शतरूपा।
पुराणों में हिंदू इतिहास की शुरुआत
सृष्टि उत्पत्ति से ही मानी जाती है,
ऐसा कहना की यहाँ से शुरुआत हुई यह शायद
उचित न होगा फिर भी वेद-पुराणों में मनु (प्रथम
मानव) से और भगवान कृष्ण की पीढ़ी तक
का इसमें उल्लेख मिलता है।- जानिए हिन्दू धर्म को-2
हिन्दू धर्म की मुख्य बातें
किसी भी धर्म के मूल तत्त्व उस धर्म को मानने
वालों के विचार, मान्यताएँ, आचार
तथा संसार एवं लोगों के प्रति उनके दृष्टिकोण
को ढालते हैं। हिंदू धर्म की बुनियादी पाँच
बातें तो है ही, (1.वंदना, 2.वेदपाठ, 3.व्रत,
4.तीर्थ, और 5.दान) लेकिन इसके
अलावा निम्न सिद्धांत को भी जानें:-
1. ब्रह्म ही सत्य है: ईश्वर एक ही है और
वही प्रार्थनीय तथा पूजनीय है। वही सृष्टा है
वही सृष्टि भी। शिव, राम, कृष्ण आदि सभी उस
ईश्वर के संदेश वाहक है। हजारों देवी-
देवता उसी एक के प्रति नमन हैं। वेद, वेदांत और
उपनिषद एक ही परमतत्व को मानते हैं।
2. वेद ही धर्म ग्रंथ है : कितने लोग हैं जिन्होंने वेद
पढ़े? सभी ने पुराणों की कथाएँ जरूर सुनी और उन
पर ही विश्वास किया तथा उन्हीं के आधार पर
अपना जीवन जिया और कर्मकांड किए। पुराण,
रामायण और महाभारत धर्मग्रंथ नहीं इतिहास
ग्रंथ हैं। ऋषियों द्वारा पवित्र ग्रंथों, चार वेद
एवं अन्य वैदिक साहित्य की दिव्यता एवं
अचूकता पर जो श्रद्धा रखता है वही सनातन धर्म
की सुदृढ़ नींव को बनाए रखता है।
3. सृष्टि उत्पत्ति व प्रलय : सनातन हिन्दू धर्म
की मान्यता है कि सृष्टि उत्पत्ति, पालन एवं
प्रलय की अनंत प्रक्रिया पर चलती है। गीता में
कहा गया है कि जब ब्रह्मा का दिन उदय
होता है, तब सब कुछ अदृश्य से दृश्यमान
हो जाता है और जैसे ही रात होने लगती है, सब
कुछ वापस आकर अदृश्य में लीन हो जाता है। वह
सृष्टि पंच कोष तथा आठ तत्वों से मिलकर
बनी है। परमेश्वर सबसे बढ़कर है।
4. कर्मवान बनो : सनातन हिन्दू धर्म भाग्य से
ज्यादा कर्म पर विश्वास रखता है। कर्म से
ही भाग्य का निर्माण होता है। कर्म एवं
कार्य-कारण के सिद्धांत अनुसार प्रत्येक
व्यक्ति अपने भविष्य के लिए पूर्ण रूप से स्वयं
ही उत्तरदायी है। प्रत्येक व्यक्ति अपने मन, वचन
एवं कर्म की क्रिया से अपनी नियति स्वयं तय
करता है। इसी से प्रारब्ध बनता है। कर्म
का विवेचन वेद और गीता में दिया गया है।
5. पुनर्जन्म : सनातन हिन्दू धर्म पुनर्जन्म में
विश्वास रखता है। जन्म एवं मृत्यु के निरंतर
पुनरावर्तन की प्रक्रिया से गुजरती हुई
आत्मा अपने पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर
धारण करती है। आत्मा के मोक्ष प्राप्त करने से
ही यह चक्र समाप्त होता है।
6. प्रकति की प्रार्थना : वेद प्राकृतिक
तत्वों की प्रार्थना किए जाने के रहस्य
को बताते हैं। ये नदी, पहाड़, समुद्र, बादल,
अग्नि, जल, वायु, आकाश और हरे-भरे प्यारे वृक्ष
हमारी कामनाओं की पूर्ति करने वाले हैं अत:
इनके प्रति कृतज्ञता के भाव हमारे जीवन
को समृद्ध कर हमें सद्गति प्रदान करते हैं।
इनकी पूजा नहीं प्रार्थना की जाती है। यह
ईश्वर और हमारे बीच सेतु का कार्य करते हैं।
यही दुख मिटाकर सुख का सृजन करते हैं।
7. गुरु का महत्व : सनातन धर्म में सद्गुरु के समक्ष वेद
शिक्षा-दिक्षा लेने का महत्व है।
किसी भी सनातनी के लिए एक गुरु
(आध्यात्मिक शिक्षक) का मार्ग दर्शन आवश्यक
है। गुरु की शरण में गए बिना अध्यात्म व जीवन के
मार्ग पर आगे बढ़ना असंभव है। लेकिन वेद यह
भी कहते हैं कि अपना मार्ग स्वयं चुनों।
जो हिम्मतवर है वही अकेले चलने की ताकत रखते
हैं।
No comments:
Post a Comment