Wednesday, 21 May 2014

वो किसी गुरु-दक्षिणा से कम नहीं है

हनुमान: एक कथा शायद आपने सुनी ना हो
प्रभु तो पवनपुत्र हैं, लेकिन वो तो शंकर के भी पुत्र हैं । एक कथा शायद आपने सुनी ना हो । एक बार प्रभु शिव तथा माता पार्वती वन क्रीडा में लीन थे । दोनों वानर रूप धारण कर काम क्रीडा के उत्सुक हुए । किन्तु माता पार्वती ने वानर रूप धारी प्रभु शंकर के वीर्य को धारण करना अस्वीकार किया । प्रभु शंकर का वीर्य धारण करने के लिये वरुण देव उपस्थित हुये । जिस प्रकार कुमार कार्तिकेय के जऩ्म के समय अग़्नि ने प्रभु शिव का वीर्य धारण किया था उसी प्रकार आज वरुण ने किया । किन्तु जैसी उष्मा, जैसी शक्ति उसमे तब थी वैसी ही तो आज भी थी ना । वीर्य की रक्षा तो वरुण ने की किन्तु धारण तो उसे एक स्त्री की शीलता ही कर सकती थी । माँ अंजना ने प्रभु शिव के दैविक वीर्य को धारण किया और तब यह धरती प्रभु हनुमान के आगम्न से सुखी हुई । शिव-पार्वती, अंजना-केसरी, वरुण, सुर्य कितने ही असीम व्यकित्त्व हनुमान के जीवन में समावेश हैं । जब हनुमान को सुर्य के महाग्यानि होने का पता चला तो उन्होंने अपने शरीर को बड़ा करके सुर्य की कक्षा में रख दिया और सुर्य से विनती की कि वो उन्हें अपना शिष्य स्वीकार करें। मगर सुर्य ने उनका अनुरोध ये कहकर अस्वीकार कर दिया कि चुंकि वो अपने कर्म स्वरूप सदैव अपने रथ पे भ्रमण करते रहते हैं, अतः हनुमान प्रभावपूर्ण तरीके से शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाएँगे। सुर्य देव की बातों से विचलित हुए बिना हनुमान ने अपने शरीर को और बड़ा करके अपने एक पैर को पूर्वी छोर पे और दूसरे पैर को पश्चिमी छोर पे रखकर पुनः सुर्य देव से विनती की और अंततः हनुमान के सतात्य(दृढ़ता) से प्रसन्न होकर सुर्य ने उन्हें अपना शिष्य स्वीकार कर लिया।
तदोपरान्त हनुमान ने सुर्य देव के साथ निरंतर भ्रमण करके अपनी शिक्षा ग्रहण की। शिक्षा पूर्ण होने के ऊपरांत हनुमान ने सुर्य देव से गुरु-दक्षिणा लेने के लिये आग्रह किया परन्तु सुर्य देव ने ये कहकर मना कर दिया कि 'तुम जैसे समर्पित शिष्य को शिक्षा प्रदान करने में मैने जिस आनंद की अनुभूती की है वो किसी गुरु-दक्षिणा से कम नहीं है'।परन्तु हनुमान के पुनः आग्रह करने पर सुर्य देव ने गुरु-दक्षिणा स्वरूप हनुमान को सुग्रीव(धर्म पुत्र-सुर्य)की सहायता करने की आज्ञा दे दी।
हनुमान के इच्छानुसार सुर्य देव का हनुमान को शिक्षा देना सुर्य देव के अनन्त, अनादि, नित्य, अविनाशी और कर्म-साक्षी होने का वर्णन करता है।

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