Wednesday, 21 May 2014

किस तरह से मेरे को सेवा मिल जाय

कर्म सेवा और पूजा

तीन तरह का काम है-एक काम करना है,एक सेवा करना है,एक पूजा करना है।काम तो नौकर भी कर देगा।जिसमें सेवकपन का भाव रहता है वह सेवा करता है जबकि काम वह-का-वह ही है।उस समय वह सेवा हो जाती है और वह ही जब जिसकी आज्ञा का पालन करता है,उसपर बहुत पूज्य भाव रखता है,जैसे भगवद्‌बुद्धि है,भगवान्‌ है साक्षात्‌,वे कहें कि तू ऐसा कर दे तो कितना आनन्द आवे इसमें! वह पूजा होती है,वह ही काम पूजा हो जायेगा।पिता की सेवा करने में भीतर में पूज्य भाव रहे कि मेरा अहोभाग्य है।जीवन सफल हो गया,समय सफल हो गया,वस्तु सफल हो गयी।तब वह पूजा हो जाती है।आदर ज्यादा होनेसे पूजा,कम आदर होनेसे सेवा और स्वार्थके लिये,तनख्वाहके लिये काम करता हो तो वह है काम-ये तीन भेद हो जाते हैं भाव के कारणसे। जितना ही भाव त्यागका होता है,उतना ही श्रेष्ठ होता है।अपने द्वारा कामना का त्याग और उसमें पूजा-बुद्धि ये दो चीजें है खास।

सेवा-बुद्धिसे भी विशेष अगर पूजा बुद्धि से करता है तो स्वयं गदगद्‌ हो जाता है,मस्त हो जाता है वह,कहीं सेवा का काम मिले तो।सेवा में पूजा बुद्धि होती है तो निहाल हो जाता है।

देखो, भारी तब लगता है, जब आज्ञा देनेवाला है, उसमें आदर-बुद्धि नहीं है, पूज्य-बुद्धि नहीं है और पूज्य-बुद्धि होती तो वह कुछ कह दे तो इतनी खुशी होती है कि कह नहीं सकते। कभी कहते नहीं, मेरेको कह दिया, कितने आनन्दकी बात है ! आप-से-आप यदि करते तो इतने फायदेकी नहीं होती। उन्होंने आज्ञा दे दिया। मेरेको कह दिया ओ हो ! मैं तो बड़ा भागी हूँ ऐसे बहुत आनन्द आता है; परन्तु आज्ञा देनेवालेमें पूज्यबुद्धि आदरभाव होना चाहिये। 

जहाँ पूज्यभाव होता है वहाँ भारी नहीं लगता।वो तो त्याग करते रहता है,हरदम ही विचार करते रहता है।किस तरह से मेरे को सेवा मिल जाय।सेवा मिल जाय तो अपना अहोभाग्य समझता है कि बस निहाल हो गया आज तो! और ऐसा मालूम पड़ता है कि उनकी कृपा से ही यह हो रहा है।मेरे में यह भाव है न,यह इनकी कृपा है।काम भी इनकी कृपा से ही होता है।वह तो जीवन्मुक्त हो गया महाराज! इतना मस्त हो गया! उसकी तो सेवा-पूजा देखकर दूसरे आदमियों का कल्याण हो जाय।अगर उसका भाव यह है तो ऐसी बात है और भारी लगता है तो आलस्य है,प्रमाद है अभिमान आदि दोष है।

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