== काल ब्रह्म द्वारा आत्मा को जीवात्मा रूप देना ==
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परम अक्षर ब्रह्म अर्थात् परमेश्वर से बिछुड़ने के पश्चात् आत्माऐं क्षरब्रह्म के साथ यहाँ पर आ गई। क्षर ब्रह्म (काल रूपी ब्रह्म) ने अपनी चतुरता से आत्मा के ऊपर कई आवर्ण चढ़ा दिए तथा आत्मा को जीव रूप दे दिया। जीव पर सुक्ष्म शरीर अन्तिम आवरण है। सुक्ष्म शरीर पर स्थूल शरीर वचन शक्ति से तथा नरमादा के संयोग से चढ़ता है।
स्थूल शरीर दो प्रकार का होता है। एक नूरी (तेज पुण्ज का) स्थूल शरीर जो देवताओं को प्राप्त होता है, (जैसे दुर्गा तथा काल ब्रह्म के मिलन से ब्रह्मा-विष्णु-महेश का शरीर तेजपुंज का नर-मादा से प्राप्त हुआ) नूरी स्थूल शरीर में एक श्रेणी लिंग शरीर भी होता है जो भक्ति प्रताप से प्राप्त होता है।
तेज पूण्ज का शरीर (जो नूरी स्थूल शरीर की अन्य श्रेणी है) दो प्रकार से प्राप्त होता है एक नर-मादा के संयोग से (अन्य देवी-देवताओं के संयोग से प्राप्त होता है) दूसरा शब्द शक्ति व सिद्धी से (जैसे दुर्गा ने अपनी शब्द शक्ति से सावित्री, लक्ष्मी तथा पार्वती तेजपुंज के शरीर युक्त उत्पन्न की) दूसरा स्थूल शरीर पांच तत्व (आकाश, वायु, अग्नि, जल व पृथ्वी के विशेष अनुपात से बना पांच तत्व) का होता है जो कई प्रकार से जीव को प्राप्त होता है।
(1) एक नर-मादा के संयोग से
(2) दूसरा विशेष वातावरण से (सुरसी जो गेहूं में अपने आप उत्पन्न हो जाती है। ढेरे- जो बालों में या शरीर पर डाले कपड़ों में उत्पन्न हो जाते हैं। उन कीड़ों को ढेरे कहते हैं।
(3) तीसरे किसी ऋषि या प्रभु या सन्त के वचन से जीव को प्राप्त होता है। जैसे महर्षि वालमीकी ने कुशा से कुश उत्पन्न किया था। जो सीता जी का पुत्र था। उपरोक्त सर्व शरीर जीवात्मा को पाप व पुण्य के आधार से प्राप्त होते हैं।
विशेषकर स्थूल शरीर प्राप्त प्राणियों को चार श्रेणियों (चार खानियों) में विभाजित किया गया है।
1. अण्डर्ज (अण्डों में उत्पत्ति)
2. जेरज (जेर में उत्पत्ति जैसे पशु व मानव जेर में उत्पन्न होते हैं।
3. स्वेतज (पसीने से उत्पत्ति जैसे ढेरे, कीड़े आदि)
4.उद्धभूज (गेहूं आदि कनक में सुरसी आदि जैसे गुलर के फल में जीव उत्पन्न होते हैं)
उपरोक्त चार खानी अर्थात्त चार श्रेणियों में उत्पन्न होने वाले प्राणी चैरासी लाख प्रकार के हैं। जो स्थूल शरीर धारण करते हैं।
नूरी (तेज पुण्ज) के शरीर कई प्रकार के होते हैं।
देवताओं का भी नूरी शरीर है। श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी का भी नूरी शरीर है जो अन्य देवताओं से अधिक तेजोमय है। इन तीनों देवताओं के शरीर से अधिक तेजोमय शरीर इनके पिता श्री क्षर पुरूष अर्थात् काल रूपी ब्रह्म का है। क्षर पुरूष से अधिक तेजोमय शरीर अक्षर पुरूष अर्थात् परब्रह्म का है। उपरोक्त सर्व प्रभुओं का नूरी शरीर नाशवान है परन्तु परम अक्षर पुरूष अर्थात् परमेश्वर (परम अक्षर ब्रह्म) का शरीर उपरोक्त प्रभुओं से अत्यधिक तेजोमय है तथा वास्तव में अविनाशी है। परम अक्षर ब्रह्म का शरीर भी तेजपुंज (नूर तत्व) का है। परन्तु स्नायु तंत्र नहीं है। अस्नाविरम् अर्थात् नाडियों रहित है। अन्य देवताओं का शरीर नाडियों सहित है चाहे वह शब्द शक्ति से प्राप्त हुआ है चाहे नर-मादा से प्राप्त हुआ है। काल ब्रह्म तथा दुर्गा का शरीर भी नाडियोँ सहित है।
आओ तेजोमय नूरी शरीरों की भिन्नता समझें ::-
जैसे एक बल्ब शुन्य वाट का, एक बल्ब 25 वाट का, एक बल्ब 100 वाट का, एक बल्ब 1000 वाट का होता है। सर्व का प्रकाश (नूर) है परन्तु चमक में अन्तर है यदि अन्य देवताओं को 25 वाट के प्रकाश युक्त शरीर सहित माने तो ब्रह्मा, विष्णु व शिव का शरीर 100 वाट का जाने तथा इनके पिता काल रूपी ब्रह्म (क्षर पुरूष) का शरीर एक हजार वाट का जाने तथा अक्षर ब्रह्म (अक्षर पुरूष) का शरीर दस हजार वाट के प्रकाश समान जाने। परम अक्षर ब्रह्म अर्थात् परमेश्वर के शरीर का प्रकाश सूर्य के प्रकाश तुल्य जाने।
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परम अक्षर ब्रह्म अर्थात् परमेश्वर से बिछुड़ने के पश्चात् आत्माऐं क्षरब्रह्म के साथ यहाँ पर आ गई। क्षर ब्रह्म (काल रूपी ब्रह्म) ने अपनी चतुरता से आत्मा के ऊपर कई आवर्ण चढ़ा दिए तथा आत्मा को जीव रूप दे दिया। जीव पर सुक्ष्म शरीर अन्तिम आवरण है। सुक्ष्म शरीर पर स्थूल शरीर वचन शक्ति से तथा नरमादा के संयोग से चढ़ता है।
स्थूल शरीर दो प्रकार का होता है। एक नूरी (तेज पुण्ज का) स्थूल शरीर जो देवताओं को प्राप्त होता है, (जैसे दुर्गा तथा काल ब्रह्म के मिलन से ब्रह्मा-विष्णु-महेश का शरीर तेजपुंज का नर-मादा से प्राप्त हुआ) नूरी स्थूल शरीर में एक श्रेणी लिंग शरीर भी होता है जो भक्ति प्रताप से प्राप्त होता है।
तेज पूण्ज का शरीर (जो नूरी स्थूल शरीर की अन्य श्रेणी है) दो प्रकार से प्राप्त होता है एक नर-मादा के संयोग से (अन्य देवी-देवताओं के संयोग से प्राप्त होता है) दूसरा शब्द शक्ति व सिद्धी से (जैसे दुर्गा ने अपनी शब्द शक्ति से सावित्री, लक्ष्मी तथा पार्वती तेजपुंज के शरीर युक्त उत्पन्न की) दूसरा स्थूल शरीर पांच तत्व (आकाश, वायु, अग्नि, जल व पृथ्वी के विशेष अनुपात से बना पांच तत्व) का होता है जो कई प्रकार से जीव को प्राप्त होता है।
(1) एक नर-मादा के संयोग से
(2) दूसरा विशेष वातावरण से (सुरसी जो गेहूं में अपने आप उत्पन्न हो जाती है। ढेरे- जो बालों में या शरीर पर डाले कपड़ों में उत्पन्न हो जाते हैं। उन कीड़ों को ढेरे कहते हैं।
(3) तीसरे किसी ऋषि या प्रभु या सन्त के वचन से जीव को प्राप्त होता है। जैसे महर्षि वालमीकी ने कुशा से कुश उत्पन्न किया था। जो सीता जी का पुत्र था। उपरोक्त सर्व शरीर जीवात्मा को पाप व पुण्य के आधार से प्राप्त होते हैं।
विशेषकर स्थूल शरीर प्राप्त प्राणियों को चार श्रेणियों (चार खानियों) में विभाजित किया गया है।
1. अण्डर्ज (अण्डों में उत्पत्ति)
2. जेरज (जेर में उत्पत्ति जैसे पशु व मानव जेर में उत्पन्न होते हैं।
3. स्वेतज (पसीने से उत्पत्ति जैसे ढेरे, कीड़े आदि)
4.उद्धभूज (गेहूं आदि कनक में सुरसी आदि जैसे गुलर के फल में जीव उत्पन्न होते हैं)
उपरोक्त चार खानी अर्थात्त चार श्रेणियों में उत्पन्न होने वाले प्राणी चैरासी लाख प्रकार के हैं। जो स्थूल शरीर धारण करते हैं।
नूरी (तेज पुण्ज) के शरीर कई प्रकार के होते हैं।
देवताओं का भी नूरी शरीर है। श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी का भी नूरी शरीर है जो अन्य देवताओं से अधिक तेजोमय है। इन तीनों देवताओं के शरीर से अधिक तेजोमय शरीर इनके पिता श्री क्षर पुरूष अर्थात् काल रूपी ब्रह्म का है। क्षर पुरूष से अधिक तेजोमय शरीर अक्षर पुरूष अर्थात् परब्रह्म का है। उपरोक्त सर्व प्रभुओं का नूरी शरीर नाशवान है परन्तु परम अक्षर पुरूष अर्थात् परमेश्वर (परम अक्षर ब्रह्म) का शरीर उपरोक्त प्रभुओं से अत्यधिक तेजोमय है तथा वास्तव में अविनाशी है। परम अक्षर ब्रह्म का शरीर भी तेजपुंज (नूर तत्व) का है। परन्तु स्नायु तंत्र नहीं है। अस्नाविरम् अर्थात् नाडियों रहित है। अन्य देवताओं का शरीर नाडियों सहित है चाहे वह शब्द शक्ति से प्राप्त हुआ है चाहे नर-मादा से प्राप्त हुआ है। काल ब्रह्म तथा दुर्गा का शरीर भी नाडियोँ सहित है।
आओ तेजोमय नूरी शरीरों की भिन्नता समझें ::-
जैसे एक बल्ब शुन्य वाट का, एक बल्ब 25 वाट का, एक बल्ब 100 वाट का, एक बल्ब 1000 वाट का होता है। सर्व का प्रकाश (नूर) है परन्तु चमक में अन्तर है यदि अन्य देवताओं को 25 वाट के प्रकाश युक्त शरीर सहित माने तो ब्रह्मा, विष्णु व शिव का शरीर 100 वाट का जाने तथा इनके पिता काल रूपी ब्रह्म (क्षर पुरूष) का शरीर एक हजार वाट का जाने तथा अक्षर ब्रह्म (अक्षर पुरूष) का शरीर दस हजार वाट के प्रकाश समान जाने। परम अक्षर ब्रह्म अर्थात् परमेश्वर के शरीर का प्रकाश सूर्य के प्रकाश तुल्य जाने।
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