एक दीया -- जो जले बिन बाती बिन तेल मनुष्य की चेतना रहस्यमय है। इसमें अनेक विलक्षणताएं पाई जाती है, किंतु इसमें जो हृदय है वह हजारों वाट के बल्व के समान ज्योतिर्मय है, किंतु उसे जलाने के लिए ज्ञानरूपी स्विच की आवश्यकता है। इसके खोल देने मात्र से चारों ओर आनंदमय प्रकाश भर जाता है। इस स्विच को जो महामानव खोलना सिखाये उसी को ही सदगुरु कहते हैं क्योंकि वो स्वयं में शरीर नहीं बल्कि चैतन्य का प्रकाशपुंज मात्र है और हमारी चेतना के स्तर विशेष के कारण वो इस शरीर में दिखाई देता है।
काली अमावस्या की रात्रि छोटे-छोटे दीपों के जलते ही प्रकाश से भर जाती है, किंतु दीपों का साथ जब तेल व बत्ती छोड़ने लगती है तो पुन: अंधकार में सारी खुशियां धीरे-धीरे विलीन होने लगती हैं। यदि हम अपने अंदर अंतरात्मा में पंचतत्व रूपी तेल डालकर उसे ज्ञानरूपी बत्ती से प्रकाशित करें तो मन में उठने वाले सारे कलुषित विचार नष्ट होने लगेंगे। हम सबके अंतरजगत में जो चैतन्य का दीया है वो बिना बाती बिना तेल के शाश्वत रूप में जलता है और उस प्रकाश को देखने के पश्चात ही स्थूल व सूक्ष्म प्रकाश में अंतर दिखाई देगा। आत्मा और परमात्मा के सही मायने समझ में आ जाते हैं। जब ज्ञान का प्रकाश संचार जीवात्मा में भर जाता है तो मानव महामानव बनकर अनेक मन में बुझे दीपक को जलाकर सहजता से आलोकित करते हैं। जिसके मन में अंतरमन का दीप नहीं जला तो उसमें अनेक विकार बने रहते हैं। आंतरिक अंधकार के कारण ही हम सभी आपस में समानता का भाव नहीं ला पाते हैं।
इसमें अनेक द्वेष व पाखंड परिलक्षित होने लगते है। इस समय भौतिक सुख व धन लोलुपता की दौड़ है। सभी इसमे आगे बढ़ने के लिए साम, दाम, दंड, भेद नीति से भागते हैं। वास्तविक प्रकाश तो तभी दिखेगा जब आपसी सामंजस्य, सौहार्द, ज्ञान, दया का दीप जलाएंगे। तभी समाज में प्रेम व उदारता, सहिष्णुता का दीप जलेगा। सभी आपस में मिलकर ऐसी ज्योति जलाएं जिससे एक-एक मानवरूपी ज्ञान दीप जल उठे। ऐसे सार्थक दीप से जीवन व सृष्टि का कोना-कोना प्रकाशित हो जाए और विश्व में शांति लाने का एकमात्र यही रास्ता है।
काली अमावस्या की रात्रि छोटे-छोटे दीपों के जलते ही प्रकाश से भर जाती है, किंतु दीपों का साथ जब तेल व बत्ती छोड़ने लगती है तो पुन: अंधकार में सारी खुशियां धीरे-धीरे विलीन होने लगती हैं। यदि हम अपने अंदर अंतरात्मा में पंचतत्व रूपी तेल डालकर उसे ज्ञानरूपी बत्ती से प्रकाशित करें तो मन में उठने वाले सारे कलुषित विचार नष्ट होने लगेंगे। हम सबके अंतरजगत में जो चैतन्य का दीया है वो बिना बाती बिना तेल के शाश्वत रूप में जलता है और उस प्रकाश को देखने के पश्चात ही स्थूल व सूक्ष्म प्रकाश में अंतर दिखाई देगा। आत्मा और परमात्मा के सही मायने समझ में आ जाते हैं। जब ज्ञान का प्रकाश संचार जीवात्मा में भर जाता है तो मानव महामानव बनकर अनेक मन में बुझे दीपक को जलाकर सहजता से आलोकित करते हैं। जिसके मन में अंतरमन का दीप नहीं जला तो उसमें अनेक विकार बने रहते हैं। आंतरिक अंधकार के कारण ही हम सभी आपस में समानता का भाव नहीं ला पाते हैं।
इसमें अनेक द्वेष व पाखंड परिलक्षित होने लगते है। इस समय भौतिक सुख व धन लोलुपता की दौड़ है। सभी इसमे आगे बढ़ने के लिए साम, दाम, दंड, भेद नीति से भागते हैं। वास्तविक प्रकाश तो तभी दिखेगा जब आपसी सामंजस्य, सौहार्द, ज्ञान, दया का दीप जलाएंगे। तभी समाज में प्रेम व उदारता, सहिष्णुता का दीप जलेगा। सभी आपस में मिलकर ऐसी ज्योति जलाएं जिससे एक-एक मानवरूपी ज्ञान दीप जल उठे। ऐसे सार्थक दीप से जीवन व सृष्टि का कोना-कोना प्रकाशित हो जाए और विश्व में शांति लाने का एकमात्र यही रास्ता है।
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