एक राजा ने अपने नगर के पापी और पुण्यात्माओं का पता लगाना चाहा और मंत्री को कहा । मंत्री ने कहा- परीक्षा करली जाय । फिर परिक्षा के लिये नगर के बाहर दो बड़े-बड़े चबूतरे बनवाये । फिर एक पर पुण्यात्माओं के बैठने के लिये है यह बोर्ड लगा दिया और दूसरे पर इस पर पापात्मा बैठे यह बोर्ड लगा दिया । परीक्षा के नियत दिन नगर के लोग गये । पुण्यात्माओं का चबूतरा पूर्ण रुप से भर गया किन्तु पापात्मा के चबुतरे पर एक अवधूत संत ही बैठे थे । राजा देखने आया तो देखकर संत के पास गया और प्रणाम करके बोला- आपको तो पुण्यात्माओं के चबूतरे पर बैठना चाहिये था ।
ईश्वर के आगे मैं अपने को पुण्यात्मा सिद्ध करने में असमर्थ हूँ इसी से इस पर बैठा हूँ । तब राजा समझ गये कि- यह एक संत ही वास्तव में पुण्यात्मा हैं, शेष सब तो पुण्यात्माओं के चबूतरे पर बैठने वाले ही हैं । संत सभी अपने को ईश्वर के आगे निर्दोष नहीं कहते हें । यह प्रसिद्ध है ।
ईश्वर के आगे मैं अपने को पुण्यात्मा सिद्ध करने में असमर्थ हूँ इसी से इस पर बैठा हूँ । तब राजा समझ गये कि- यह एक संत ही वास्तव में पुण्यात्मा हैं, शेष सब तो पुण्यात्माओं के चबूतरे पर बैठने वाले ही हैं । संत सभी अपने को ईश्वर के आगे निर्दोष नहीं कहते हें । यह प्रसिद्ध है ।
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