कबीर साहब बोले - हे धर्मदास ! सभी योनियों में श्रेष्ठ यह मनुष्य देह सुख को देने वाली है । इस मनुष्य देह में ही गुरु ज्ञान समाता है । जिसको प्राप्त कर मनुष्य अपना कल्याण कर सकता है । ऐसा मनुष्य सरीर पाकर जीव जहाँ भी जाता है । सदगुरु की भक्ति के बिना दुख ही पाता है ।
मनुष्य देह को पाने के लिये जीव को 84 के भयानक महाजाल से गुजरना ही होता है । फ़िर भी यह देह पाकर मनुष्य अज्ञान और पाप में ही लगा रहता है । तो उसका घोर पतन निश्चित है । उसे फ़िर से भयंकर कष्टदायक साढे 12 लाख साल की 84 धारा से गुजरना होगा । दर बदर भटकना होगा ।
सत्य ज्ञान के बिना मनुष्य तुच्छ विषय भोगों के पीछे भागता हुआ अपना जीवन बिना परमार्थ के ही नष्ट कर लेता है । ऐसे जीव का कल्याण किस तरह हो सकता है ? उसे मोक्ष भला कैसे मिलेगा ? अतः इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये सतगुरु की तलाश और उनकी सेवा भक्ति अति आवश्यक है ।
हे धर्मदास ! मनुष्य के भोग उद्देश्य से 84 धारा या 84 लाख योनियाँ रची गयीं हैं । सांसारिक माया और मन इन्द्रियों के विषयों के मोह में पङकर मनुष्य की बुद्धि ( विवेक ) का नाश हो जाता है । वह मूढ अज्ञानी ही हो जाता है । और वह सदगुरु के शब्द उपदेश को नहीं सुनता । तो वह मनुष्य 84 को नहीं छोङ पाता ।
उस अज्ञानी जीव को भयंकर काल निरंजन 84 में लाकर डालता है । जहाँ भोजन । नींद । डर और मैथुन के अतिरिक्त किसी पदार्थ का ज्ञान या अन्य ज्ञान बिलकुल नहीं है । 84 लाख योनियों के विषय वासना के प्रबल संस्कार के वशीभूत हुआ ये जीव बार बार क्रूर काल के मुँह में जाता है । और अत्यन्त दुखदायी जन्म मरण को भोगता हुआ भी ये अपने कल्याण का साधन नहीं करता ।
हे धर्मदास ! अज्ञानी जीवों की इस घोर विपत्ति संकट को जानकर उन्हें सावधान करने के लिये ( सन्तों ने ) पुकारा । और बहुत प्रकार से समझाया कि मनुष्य शरीर पाकर सत्यनाम गृहण करो । और इस सत्यनाम के प्रताप से अपने निज धाम सत्यलोक को प्राप्त करो । आदि पुरुष के विदेह ( बिना वाणी से जपा जाने वाला ) और स्थिर आदि नाम ( जो शुरूआत से एक ही है ) को जो जाँच समझकर ( सच्चे गुरु से - मतलब ये नाम मुँह से जपने के बजाय धुनि रूप होकर प्रकट हो जाय । यही सच्चे गुरु और सच्ची दीक्षा की पहचान है ) जो जीव गृहण करता है । उसका निश्चित ही कल्याण होता है । गुरु से प्राप्त ज्ञान से आचरण करता हुआ वह जीव सार को गृहण करने वाला नीर क्षीर विवेकी
( हँस की तरह दूध और पानी के अन्तर को जानने वाला ) हो जाता है । और कौवे की गति ( साधारण और दीक्षा रहित मनुष्य ) त्याग कर हँस गति वाला हो जाता है । इस प्रकार की ज्ञान दृष्टि के प्राप्त होने से वह विनाशी तथा अविनाशी का विचार करके इस नश्वर नाशवान जङ देह के भीतर ही अगोचर और अविनाशी परमात्मा को देखता है ।
हे धर्मदास ! विचार करो । वह निअक्षर ( शाश्वत नाम ) ही सार है । जो अक्षर ( ज्योति जिस पर सभी योनियों के शरीर बनते हैं । ..ध्यान की एक ऊँची स्थिति ) से प्राप्त होता है । सब जङ तत्वों से परे वही असली सारतत्व है ।
मनुष्य देह को पाने के लिये जीव को 84 के भयानक महाजाल से गुजरना ही होता है । फ़िर भी यह देह पाकर मनुष्य अज्ञान और पाप में ही लगा रहता है । तो उसका घोर पतन निश्चित है । उसे फ़िर से भयंकर कष्टदायक साढे 12 लाख साल की 84 धारा से गुजरना होगा । दर बदर भटकना होगा ।
सत्य ज्ञान के बिना मनुष्य तुच्छ विषय भोगों के पीछे भागता हुआ अपना जीवन बिना परमार्थ के ही नष्ट कर लेता है । ऐसे जीव का कल्याण किस तरह हो सकता है ? उसे मोक्ष भला कैसे मिलेगा ? अतः इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये सतगुरु की तलाश और उनकी सेवा भक्ति अति आवश्यक है ।
हे धर्मदास ! मनुष्य के भोग उद्देश्य से 84 धारा या 84 लाख योनियाँ रची गयीं हैं । सांसारिक माया और मन इन्द्रियों के विषयों के मोह में पङकर मनुष्य की बुद्धि ( विवेक ) का नाश हो जाता है । वह मूढ अज्ञानी ही हो जाता है । और वह सदगुरु के शब्द उपदेश को नहीं सुनता । तो वह मनुष्य 84 को नहीं छोङ पाता ।
उस अज्ञानी जीव को भयंकर काल निरंजन 84 में लाकर डालता है । जहाँ भोजन । नींद । डर और मैथुन के अतिरिक्त किसी पदार्थ का ज्ञान या अन्य ज्ञान बिलकुल नहीं है । 84 लाख योनियों के विषय वासना के प्रबल संस्कार के वशीभूत हुआ ये जीव बार बार क्रूर काल के मुँह में जाता है । और अत्यन्त दुखदायी जन्म मरण को भोगता हुआ भी ये अपने कल्याण का साधन नहीं करता ।
हे धर्मदास ! अज्ञानी जीवों की इस घोर विपत्ति संकट को जानकर उन्हें सावधान करने के लिये ( सन्तों ने ) पुकारा । और बहुत प्रकार से समझाया कि मनुष्य शरीर पाकर सत्यनाम गृहण करो । और इस सत्यनाम के प्रताप से अपने निज धाम सत्यलोक को प्राप्त करो । आदि पुरुष के विदेह ( बिना वाणी से जपा जाने वाला ) और स्थिर आदि नाम ( जो शुरूआत से एक ही है ) को जो जाँच समझकर ( सच्चे गुरु से - मतलब ये नाम मुँह से जपने के बजाय धुनि रूप होकर प्रकट हो जाय । यही सच्चे गुरु और सच्ची दीक्षा की पहचान है ) जो जीव गृहण करता है । उसका निश्चित ही कल्याण होता है । गुरु से प्राप्त ज्ञान से आचरण करता हुआ वह जीव सार को गृहण करने वाला नीर क्षीर विवेकी
( हँस की तरह दूध और पानी के अन्तर को जानने वाला ) हो जाता है । और कौवे की गति ( साधारण और दीक्षा रहित मनुष्य ) त्याग कर हँस गति वाला हो जाता है । इस प्रकार की ज्ञान दृष्टि के प्राप्त होने से वह विनाशी तथा अविनाशी का विचार करके इस नश्वर नाशवान जङ देह के भीतर ही अगोचर और अविनाशी परमात्मा को देखता है ।
हे धर्मदास ! विचार करो । वह निअक्षर ( शाश्वत नाम ) ही सार है । जो अक्षर ( ज्योति जिस पर सभी योनियों के शरीर बनते हैं । ..ध्यान की एक ऊँची स्थिति ) से प्राप्त होता है । सब जङ तत्वों से परे वही असली सारतत्व है ।
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