हे धर्मदास ! ऐसे लक्षणों से युक्त मनुष्य से ज्ञान वार्ता करने का अवसर कभी खोना नहीं चाहिये । और अवसर मिलते ही उससे ज्ञान चर्चा करनी चाहिये । जो जीव सदगुरु के शब्द ( नाम या महामंत्र ) रूपी उपदेश को पाता है । और भली प्रकार गृहण करता है । उसके जन्म जन्म का पाप और अज्ञान रूपी मैल छूट जाता है । सत्यनाम का प्रेमभाव से सुमरन करने वाला जीव भयानक काल माया के फ़ंदे से छूटकर सत्यलोक जाता है । सदगुरु के शब्द उपदेश को ह्रदय में धारण करने वाला जीव अमृतमय अनमोल होता है । वह सत्यनाम साधना के बल पर अपने असली घर अमरलोक ( या सत्यलोक एक ही बात है ) चला जाता है । जहाँ सदगुरु के हँस जीव सदा आनन्द करते हैं । और अमृत का आहार करते हैं । जबकि काल निरंजन के जीव कागदशा ( विष्ठा मल के समान घृणित वासनाओं के लालची ) में भटकते हुये जन्म मरण के काल झूले में झूलते रहते हैं ।
सत्यनाम के प्रताप से काल निरंजन जीव को सत्यलोक जाने से नहीं रोकता । क्योंकि महाबली काल निरंजन केवल इसी से भयभीत रहता है । उस जीव पर सदगुरु के वंश की छाप ( दीक्षा के समय लगने वाली नाम मोहर ) देखकर काल बेबशी से सिर झुकाकर रह जाता है ।
तब धर्मदास बोले - हे साहिब ! आपने चार खानि के जो विचार कहे । वो मैंने सुने । अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि 84 लाख योनियों की यह धारा का विस्तार किस कारण से किया गया । और इस अविनाशी जीव को अनगिनत कष्टों में डाल दिया गया । मनुष्य के कारण ही यह सृष्टि बनायी गयी है । या कि कोई और जीव को भी भोग भुगतने के लिये बनायी गयी है ?
सत्यनाम के प्रताप से काल निरंजन जीव को सत्यलोक जाने से नहीं रोकता । क्योंकि महाबली काल निरंजन केवल इसी से भयभीत रहता है । उस जीव पर सदगुरु के वंश की छाप ( दीक्षा के समय लगने वाली नाम मोहर ) देखकर काल बेबशी से सिर झुकाकर रह जाता है ।
तब धर्मदास बोले - हे साहिब ! आपने चार खानि के जो विचार कहे । वो मैंने सुने । अब मैं यह जानना चाहता हूँ कि 84 लाख योनियों की यह धारा का विस्तार किस कारण से किया गया । और इस अविनाशी जीव को अनगिनत कष्टों में डाल दिया गया । मनुष्य के कारण ही यह सृष्टि बनायी गयी है । या कि कोई और जीव को भी भोग भुगतने के लिये बनायी गयी है ?
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