Thursday, 8 May 2014

यहाँ के रसिक/संत जिस आनन्द को लेते हैं

यदि वास्तव में भक्ति-भाव से आप श्रीधाम वृन्दावन आते हैं और यहाँ आने का, यहाँ के आनन्द का पूर्ण लाभ लेना चाहते हैं तो यदि आप अपने वाहन से आते हैं तो उसे श्रीधाम वृन्दावन की बाहरी सीमा में पार्क कर दें ताकि न तो आपको असुविधा हो, न ही अन्य धामवासियों को। श्रीधाम के भीतर कुंज-गलियों में बड़ी-बड़ी गाड़ियों को लाना हमारे "स्टेटस और अहंकार" का ही परिचय देता है न कि विनय का, जोकि भक्ति के लिये प्रथम अनिवार्य सूत्र है। बहुत से श्रद्धालु जनसामान्य को असुविधा देते हुए एकदम ठाकुरजी के मंदिर के सामने ही उतरते-चढ़ते हैं, जिसके कारण वह अन्य लोगों की भावनाओं को अनजाने ही ठेस पहुँचाते हैं क्योंकि श्रीधाम में चौड़ी सड़कें नहीं है, यह तो कुंज गलियों का स्थान है और बड़े वाहन यातायात और जनसामान्य के लिये बड़ी ही असुविधाजनक स्थिति उत्पन्न कर देते हैं सो आगंतुकों को श्रीधामवासियों से भी प्रेम के स्थान पर उपेक्षा का ही वरण करना पड़ता हैं। यदि किसी प्रकार की विशेष असुविधा न हो [साथ में वृद्धजन न हों] तो श्रीधाम में रिक्शा या सर्वोत्तम पैदल चलें। संभव हो सके तो पाँवों में जूता-चप्पल भी न रखें, न ही मोजे ताकि आपके नंगे पाँवों को यहाँ की ब्रज-रज का स्पर्श मिल सके। समयाभाव के कारण अधिकांश श्रीधाम की परिक्रमा भी नहीं कर पाते परन्तु नंगे पाँव भ्रमण कर आप अति दुर्लभ ब्रज-रज का सानिध्य पा सकते हैं। यूँ तो श्रीधाम में कुछ ही स्थानों पर ब्रज-रज रह गयी है, अधिकांशत: तो कंक्रीट का जंगल ही हो गया है परन्तु फ़िर भी नंगे पाँव इस धाम में चलने का, कन्हैया के संगी होने का भाव ही अलग है। यहाँ के रसिक/संत जिस आनन्द को लेते हैं; आप भी उसका यत्किंचित लाभ उठा सकते हैं। यहाँ तो जो मिले, वही अमूल्य ! दुर्लभ ! 
वैसे तो श्रीधाम में प्रवेश ही श्रीकिशोरीजी की ही कृपा से हो सकता है परन्तु यदि मेरी श्रीकिशोरीजी की पूर्ण-कृपा-दृष्टी हो गयी तो दुर्लभ भी सुलभ 

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