Sunday, 4 May 2014

प्रथम स्नान करने के कारण नागा तथा वैष्णों साधुओं में घोर युद्ध हो गया

विचार करें:- रावण ने भगवान शिव जी को मृत्युंजय, अजर-अमर, सर्वेश्वर मान कर भक्ति की, दस बार शीश काट कर समर्पित कर दिया, जिसके बदले में युद्ध के दौरान दस शीश रावण को प्राप्त हुए, परन्तु मुक्ति नहीं हुई, राक्षस कहलाया। यह दोष रावण के गुरुदेव का है जिस नादान (नीम-हकीम) ने वेदों को ठीक से न समझ कर अपनी सोच से तमोगुण युक्त भगवान शिव को ही पूर्ण परमात्मा बताया तथा भोली आत्मा रावण ने झूठे गुरुदेव पर विश्वास करके जीवन व अपने कुल का नाश किया।
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एक भस्मागिरी नाम का साधक था, जिसने शिव जी (तमोगुण) को ही ईष्ट मान कर शीर्षासन(ऊपर को पैर नीचे को शीश) करके 12वर्ष तक साधना की, वचन बद्ध करके भस्मकण्डा ले लिया। भगवान शिव जी को ही मारने लगा। उद्देश्य यह था कि भस्मकण्डा प्राप्त करके भगवान शिव जी को मार कर पार्वती जी को पत्नी बनाऊँगा। भगवान श्री शिव जी डर के मारे भाग गए, फिर श्री विष्णु जी ने उस भस्मासुर को गंडहथ नाच नचा कर उसी भस्मकण्डे से भस्म किया। वह भस्मागिरी जो शंकर जी (तमोगुण) का साधक था भस्मासुर अर्थात् राक्षस कहलाया।
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हरिण्यकशिपु ने भगवान ब्रह्मा जी (रजोगुण) की साधना की तथा राक्षस कहलाया। एक समय आज से लगभग 325 वर्ष पूर्व हरिद्वार में हर की पैडि़यों पर (शास्त्र विधि रहित साधना करने वालों के) कुम्भ पर्व की प्रभी का संयोग हुआ। वहाँ पर सर्व (त्रिगुण उपासक) महात्मा जन स्नानार्थ पहुँचे। गिरी, पुरी, नाथ, नागा आदि भगवान श्री शंकर जी (तमोगुण) के उपासक तथा वैष्णों भगवान श्री विष्णु जी(सतोगुण) के उपासक हैं। प्रथम स्नान करने के कारण नागा तथा वैष्णों साधुओं में घोर युद्ध हो गया। लगभग 25000(पच्चीस हजार) त्रिगुण उपासक मृत्यु को प्राप्त हुए। जो व्यक्ति जरा-सी बात पर कत्ले आम कर देता है वह साधु है या राक्षस स्वयं विचार करें।
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आम व्यक्ति भी कहीं स्नान कर रहे हों और कोई व्यक्ति आ कर कहे कि मुझे भी कुछ स्थान स्नान के लिए देने की कृपा करें। शिष्टाचार के नाते कहते हैं कि आओ आप भी स्नान कर लो। इधर-उधर हो कर आने वाले को स्थान दे देते हैं। इसलिए पवित्र गीता जी अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 में कहा है कि जिनका मेरी त्रिगुणमई माया (रजगुण-ब्रह्मा जी, सतगुण-विष्णु जी, तमगुण-शिव जी) की पूजा के द्वारा ज्ञान हरा जा चुका है, वे केवल मान बड़ाई के भूखे राक्षस स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच अर्थात् आम व्यक्ति से भी पतित स्वभाव वाले, दुष्कर्म करने वाले मूर्ख मेरी भक्ति भी नहीं करते।
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यही भूमिका वर्तमान में श्री सुधांशु जी महाराज तथा श्री आसाराम जी महाराज कर रहे हैं जो सर्व नाम जाप के मंत्र शास्त्र विधि के विरुद्ध भक्त समाज को प्रदान कर रहे हैं तथा श्री शंकर जी तथा श्री विष्णु जी आदि की पूजा पर भक्त समाज को आधारित किए हुए हैं। इसलिए गलत मार्ग पर जा रहे हैं। पथिक को सही मार्ग बताना निंदा नहीं हित होता है। फिर भी किसी पर कोई दबाव नहीं, केवल प्रार्थना है कि शास्त्र विधि त्याग कर मनमाना आचरण (पूजा - साधना) मानव जीवन के लिए अति हानिकारक है। 
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 मानव जीवन दुर्लभ है, इसे नादान सन्तों, महन्तों व आचार्यों, महर्षियों तथा पंथों के पीछे लग कर नष्ट नहीं करना चाहिये। पूर्ण संत की खोज करके उपदेश प्राप्त करके आत्म कल्याण करवाना ही श्रेयकर है। सर्व पवित्र सद्ग्रन्थों के अनुसार अर्थात् शास्त्र अनुकूल यथार्थ भक्ति मार्ग  सर्व पवित्र धर्मों की पवित्रात्माऐं तत्वज्ञान से अपरिचित हैं। जिस कारण नकली गुरुओं, संतों, महन्तों तथा ऋषियों तथा पंथों का दाव लगा हुआ है। जिस समय पवित्र भक्त समाज आध्यात्मिक तत्वज्ञान से परिचित हो जाएगा उस समय इन नकली सन्तों, गुरुओं व आचार्यों को छुपने का स्थान नहीं मिलेगा। कुछ श्रद्धालुओं को शंका है कि गुरु जी बदलना पाप है। उनसे प्रार्थना है कि पूरे गुरुदेव की प्राप्ति होने पर अधूरे गुरु को त्याग देना समझदारी होती है। जैसे एक वैद्य से रोग ठीक नहीं होता तो दूसरे डॉक्टर के पास जाना हितकर होता है। इसी प्रकार गुरु बदलना पाप नहीं पुण्य है। 

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