Sunday, 4 May 2014

जिसके जानने के बाद और कुछ जानना बाकी नहीं रह जाता।

= तीनों गुण (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी) अर्थात् त्रिगुण माया की पूजा व्यर्थ ==
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गीता अध्याय 7श्लोक 12::

तीनों गुणों से जो कुछ हो रहा है वह मुझ से ही हुआ जान। जैसे रजगुण(ब्रह्मा) से उत्पत्ति, सतगुण(विष्णु) से पालन-पोषण स्थिति तथा तमगुण(शिव) से प्रलय(संहार) का कारण काल भगवान ही है। फिर कहा है कि मैं इन में नहीं हूँ। क्योंकि काल बहुत दूर(इक्कीसवें ब्रह्मण्ड में निज लोक में रहता है) है परंतु मन रूप में मौज काल ही मनाता है तथा रमोट से सर्व प्राणियों तथा ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी व श्री शिव जी को यन्त्र की तरह चलाता है।
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पवित्र गीता जी के अ. 7 में ब्रह्म (ज्योति निरंजन - काल) कह रहा है कि हे अर्जुन! अब तुझे वह ज्ञान सुनाऊँगा जिसके जानने के बाद और कुछ जानना बाकी नहीं रह जाता। गीता बोलने वाला ब्रह्म कह रहा है कि मेरे इक्कीस ब्रह्मण्ड़ों के प्राणियों के लिए मेरी पूजा से ही शास्त्र अनुकूल साधना प्रारम्भ होती है, जो वेदों में वर्णित है। मेरे अन्तर्गत जितने प्राणी हैं उनकी बुद्धि मेरे हाथ में है। मैं केवल इक्कीस ब्रह्मण्ड़ों में ही मालिक हूँ। इसलिए (गीता अ. 7 श्लोक 12 से 15 तक) जो भी तीनों गुणों से (रजगुण-ब्रह्मा से जीवों की उत्पत्ति, सतगुण-विष्णु जी से स्थिति तथा तमगुण-शिव जी से संहार) जो कुछ भी हो रहा है उसका मुख्य कारण मैं (ब्रह्म-काल) ही हूँ। (क्योंकि काल को शाप लगा है कि एक लाख मानव शरीर धारी प्राणियों के शरीर को मार कर मैल को खाने का) जो साधक मेरी (ब्रह्म की) साधना न करके त्रिगुणमयी माया (रजगुण-ब्रह्मा जी, सतगुण-विष्णु जी, तमगुण-शिव जी) की साधना करके क्षणिक लाभ प्राप्त करते हैं, जिससे ज्यादा कष्ट उठाते रहते हैं, साथ में संकेत किया है कि इनसे ज्यादा लाभ मैं (ब्रह्म-काल) दे सकता हूँ, परन्तु ये मूर्ख साधक तत्वज्ञान के अभाव से इन्हीं तीनों गुणों (रजगुण-ब्रह्मा जी, सतगुण-विष्णु जी, तमगुण-शिव जी) तक की साधना करते रहते हैं। इनकी बुद्धि इन्हीं तीनों प्रभुओं तक सीमित है। त्रिगुण माया अर्थात् ब्रह्मा(रजगुण), विष्णु(सतगुण) तथा शिव (तमगुण) से मिलने वाले क्षणिक लाभ के द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है। भावार्थ है कि वे फिर अन्य प्रभु की भक्ति नहीं करते। यदि कोई समझाने का प्रयत्न करता है तो उसी के दुश्मन बन जाते हैं। इसलिए गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 में कहा nहै कि तीनों प्रभुओं (त्रिगुणमाया) के पूजारी राक्षस स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच, शास्त्र विरूद्ध साधना रूपी दुष्कर्म करनेवाले, मूर्ख मुझे(ब्रह्म को)नहीं भजते। यही प्रमाण गीता अध्याय 16 श्लोक 4 से 20 व 23 , 24 तक अध्याय 17 श्लोक 2 से 14 तथा 19 व 20 में भी है।

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