Tuesday, 6 May 2014

अकेले में मृत्यु का डर लगता है

भोगी को सताता है मृत्यु का भय...........
जब मनुष्य अकेला होता है या पड़ जाता है, तब वह गलत काम करता है या भयभीत हो जाता है। संसारी लोग अकेले में उलझ जाते हैं, लेकिन अध्यात्म के मार्ग पर चलने वालों के लिए यही अकेलापन उपलब्धि बन जाता है। राम और रावण में यही अंतर था। रावण भीड़ से घिरा था। राम बिल्कुल अकेले थे, लेकिन उन्होंने ऐसी स्थितियां बना दी थीं कि रावण को लगने लगा था कि अब मैं बिल्कुल अकेला होने लगा हूं। हालांकि अहंकार के कारण वह ऐसे जताता है जैसे राम की खिल्ली उड़ा रहा हो। उसके दूत जब श्रीराम और समुद्र की चर्चा का वर्णन कर रहे थे, तो दूतों ने श्रीराम की प्रशंसा की थी।
'सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूंछेउ नय नागर।।'
वे एक ही बाण से सैकड़ों समुद्रों को सोख सकते हैं, लेकिन नीतिनिपुण श्रीरामजी ने नीति की रक्षा के लिए आपके भाई से उपाय पूछा। रावण के दूत श्रीराम को नीति में निपूण बता रहे थे और इसी के साथ वे रावण को अनीति में दक्ष भी घोषित कर रहे थे। उन्होंने अकेलेपन से घबराए रावण से कहा 'तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं।।
सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा।।'
उनके वचन सुनकर श्रीरामजी समुद्र से राह मांग रहे हैं, उनके मन में कृपा भरी है। इसलिए वे उसे सोखते नहीं। दूत के ये वचन सुनते ही रावण खूब हंसा और बोला - जब ऐसी बुद्धि है, तभी तो वानरों को सहायक बनाया है। रावण भोगी था और राम संन्यासी जैसा आचरण कर रहे थे। भोगी को अकेले में मृत्यु का डर लगता है और संन्यासी मृत्यु को ही जीने लगता है।

No comments:

Post a Comment