Monday, 5 May 2014

प्रेम से थोड़ी सी वस्तु भी मुझे अर्पण करते है

प्रेम के भूखे ,प्रेम के तंदूर ,प्रेम के भाव से खाने लगे है ,
तंदूर के दानो में प्रभु दीन की दरिद्रता, चबाने लगे है
इक -इक मुट्ठी में , एक-एक लोक, सुदामा के भाग में जाने लगे है
त्रिभुवन पति कि देख उदारता तीनो भवन थर्राने लगे है "
पहली मुट्ठी में प्रभु ने स्वर्ग सुदामा के नाम किया है,
दूसरी मुट्ठी में पृथ्वी लोक का वैभव सुदामा के नाम किया है
तीसरी मुट्ठी में देने लगे जो वैकुण्ठ तो लक्ष्मी ने रोक लिया है
अपना निवास भी दान में दे रहा , कैसा ये दानी मेरा पिया है "
"हर दाने का मोल देने लगे भगवान, रह जायेगा सृष्टि में बस इक ही धनवान"
और मन ही मन भगवान से बोली - ये आप क्या कर रहे हो, तीनो लोको का राज्य सुदामा को दे दोगे तो रहोगे कहाँ ? बस ये दो मुट्ठी चावल बहुत है.
भगवान ने कहा -रुक्मिणी आपके मुह से ये बात शोभा नहीं देती. याद करो वह दिन, जब सुदामा और उसकी पत्नी ने आधा आधा चावल का दाना हम दोनों को अर्पण किया था उस समय वह एक चावल का दाना सुदामा की सम्पूर्ण संपत्ति थी. सुदामा ने अपनी कुल पूंजी हमें अर्पण की थी तो आज हमें भी अपनी सारी सम्पति सुदामा दो अर्पण कर देनी चाहिये.तभी हिसाब बराबर होगा. पर रुक्मणि जी ने भगवान के हाथ वह पोटली छीन ली और सारी रानियाँ खाने लगी.सुदामा जी को पता भी नहीं चला कि भगवान ने क्या लीला की.
सुदामा जी अगले दिन अपने घर लौट आये, वे अपने नगर में आये तो क्या देखते है नगर के सभी लोग गाजे-बाजे से उनका स्वागत कर रहे है. उनकी स्त्री सुन्दर गहनों से सजी लक्ष्मी जैसी ही लग रही है जब उन्होंने देखा कि उनकी टूटी झोपड़ी की जगह महल खड़े है अंदर जाकर देखा तो रत्नों से जड़े खम्बे फर्श और दीवारे है इन्द्रलोक जैसा महल है. वे सोचने लगे इतनी सम्पति कहाँ से आ गयी में तो जन्म से ही दरिद्र और भाग्यहींन हूँ. यह तो केवल भगवान श्री कृष्ण के कृपा के अतरिक्त और कोई कार्ड नहीं हो सकता. मेने तो उन्हें केवल एक मुट्ठी चावल ही भेट दिये थे उन्होंने मेरे सामने तो कुछ भी नहीं कहा मुझे तो केवल उनकी भक्ति ही चाहिए.
सार
वास्तव में सुदामा जी दरिद्र थे, गरीब नहीं थे, क्योकि दरिद्र वह होता है जिसके पास संसार की कोई धन-दौलत न हो, पर अन्तःकरण से धनी होता है. और गरीब वह है जिसके पास संसार की सारी सुख सुविधाए हो, पर और पाने की चाह सदा बनी रहे. भगवान कहते है मेरे प्रेमी भक्त जब प्रेम से थोड़ी सी वस्तु भी मुझे अर्पण करते है तो वह मेरे लिए बहुत हो जाती है और में उसे केवल स्वीकार ही नहीं करता तुरंत उसे भोग लेता हूँ, प्रेम से समर्पित किया एक फल, फूल ,पत्ती, पानी कुछ भी क्यों न हो.

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