अहा ! वही ध्वनि तो है ! वही मुरलीधर की वंशी की मधुर ध्वनि ! कहाँ से आ रही है? बुद्धि कार्य नहीं करती। वे पास ही हैं पर कहाँ? कौन है जो वहाँ तक पहुँचा दे? कौन पहुँचावेगा उसे; जो स्वयं ही भटका हो ! भोगों के इस जंगल में भटकते हुए यदा-कदा जब वह वंशी का मधुर स्वर सुनायी पड़ता है, वह भी उन्हीं की कृपा से तो आत्मा व्याकुल हो उठती है मिलन के लिये। कभी इधर, कभी उधर, खोजते, भागते पीड़ा और थकान निढाल कर देती है पर उनसे मिलन नहीं हो पाता। किन्तु यह निश्चित है कि वे हैं तो आस-पास ही। विगत स्मृतियाँ मानो सजीव हो उठती हैं। जब पहली बार नन्दनन्दन गौचारण के लिये निकल रहे थे। मैया यशोदा ने स्नेहवश नन्दकिशोर को सुकोमल जूते पहिनने का आग्रह किया ताकि वन में कन्हैया के पाँवों में कोई काँटा न लगे और पीड़ा न हो तो कैसा प्रेम भरा उलाहना दिया था मैया को ! कि जब सारी नौ लाख गौओं को तुम ३६ लाख जूते पहिना दोगी तो मैं भी पहिन लूँगा ! धन्य हो नन्दनन्दन ! उस समय भी मेरी बड़ी-बड़ी कोरों से अश्रु बह निकले थे। देख लिया था तुमने और अश्रु पोंछते हुए मेरी पीठ पर हाथ फ़ेरा था। मानो धरा पर जन्म लेना सार्थक हो गया। तुम्हारे आगे-पीछे घूमते, हरी घास चरते, वंशी के मधुर स्वर का, अपने कानों से अमृत-पान करते न जाने कब अघटन घट गया और हरी घास चरते-चरते मैं निकल गयी दूर। खोज रही हूँ आज तक। वंशी स्वर सुनते ही भाग छूटती हूँ पर इस जंगल से निकलना संभव नहीं हो रहा है। अशक्त हूँ मैं, परन्तु तुम तो सर्व-शक्तिमान हो। बहुत हुआ प्रभु ! मेरी सामर्थ्य नहीं कि तुम्हें खोज सकूँ ! तुम ही मुझ तक आवो तो पाऊँ ! संभवत: ऐसी ही विरहावस्था में गोपीगीत का गान हुआ था पर मैं मूक-पशु ! क्या गाऊँ ? कैसे कहूँ कि अब विरह-वेदना नहीं सही जाती। मेरे नेत्रों में ही इस पीड़ा को देख सकोगे। आओ न गोपाल ! मैं तेरी खोई गैया, मेरी सुधि लीजो गोपाल
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