Thursday, 8 May 2014

जो कुछ मिल जाए, उसमे संतुस्ट रहना

भगवान श्रीकृष्ण भक्तवर उद्धव जी से कहते है शम, दम, तप, शौच, सन्तोष, क्षमा, कोमलता, मेरी भक्ति, दया और सत्य ये ब्राह्मण-वर्ण के स्वभाव है | तेज, बल, धैर्य, शूरवीरता, सहनशीलता, उदारता, पुरुषार्थ, स्थिरता, ब्रह्मन्यता (ब्राह्मण भक्ति) और ऐश्वर्य ये क्षत्रिय-वर्ण के स्वाभाव है | आस्तिकता, दानशीलता, दंभहीनता, विप्रपरायणता और लगातार धन-संचय करते रहना ये वैश्य-वर्ण के स्वभाव है | ब्राह्मण, गौ और देवताओं की निष्कपट भाव से सेवा करना और उसी से जो कुछ मिल जाए, उसमे संतुस्ट रहना ये शुद्र वर्ण के स्वभाव है | अहिंसा, सत्य, अस्तेय, काम, क्रोध, और लोभ से रहित होना और प्राणियों की प्रिय-हितकारिणी चेष्टा में तत्पर रहना यह सभी वर्णों के धर्म है | 

ब्रह्मचारी के धर्म

अब चारों आश्रमों में पहले ब्रह्मचारी के धर्म बतलाते है

जातकर्म आदि संस्कारों के क्रमसे उपनयन-संस्कार द्वारा दूसरा जन्म पाकर द्विज-कुमार (ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य-वर्ण का बालक) इन्द्रियदमन पूर्वक गुरुग्रह में वास करता हुआ गुरु द्वारा बुलाये जाने पर वेद का अधयन्न करे | ऐसे ब्रह्मचारी को चाहिये की मूँज की मेखला, मृगचर्म, दण्ड, रुद्राक्ष, ब्रह्मसूत्र, कमण्डलु और आप-से-आप बढ़ी हुई जटाओं को धारण करे, वस्त्रों को (शौकिनियों के लिये) न धुलवाये, रगीन आसन पर न बैठे तथा कुशाओं को धारण करे | स्नान, भोजन, होम, जप के समय मौन रहे; नख तथा कक्ष एवं उपस्थ के बालों को भी न कटवाये | 

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