Sunday, 4 May 2014

तो स्वयं भी शास्त्राअनुसार साधना करे

।। विद्वानों (शिक्षित) व्यक्तियों को चाहिए कि वे शास्त्रों अनुसार साधना करें ।।

गीता अध्याय 3श्लोक 25से 29तक का भावार्थ:- पवित्र यजुर्वेद अध्याय 40श्लोक 13में वेद ज्ञान दाता ब्रह्म ने कहा है कि जिस व्यक्ति को अक्षर ज्ञान है उसे विद्वान कहते हैं जिसे अक्षर ज्ञान नहीं है उसे अविद्वान कहते हैं। परन्तु विद्वान तथा अविद्वान की वास्तविक जानकारी तत्वदर्शी सन्त ही बताते हैं उनसे सुनों। 

पूर्ण परमात्मा कर्विदेव जी ने अपनी अमृतवाणी कविगिर(कविर्वाणी) में विद्वान तथा अविद्वान की परिभाषा बताई है। कहा है कि जिसे तत्वज्ञान है वह वास्तव में विद्वान है। केवल अक्षर ज्ञान (किसी भाषा का ज्ञान) होने से विद्वान नहीं होता। क्योंकि जो संस्कृत भाषा में विद्वान माना जाता है वह पंजाबी भाषा को न जानने वाला उस भाषा में अविद्वान है।
इसी आधार से गीता अध्याय 3 श्लोक 25 से 29तक के ज्ञान को जानना है। श्लोक 25 में कहा है कि शास्त्राअनुकूल साधना रूपी कर्तव्य कर्म में आसक्त अविद्वान अर्थात् अशिक्षित् जिस प्रकार भक्ति कर्तव्य कर्म करते हैं। विद्वान (शिक्षित्) भी लोक संग्रह अर्थात् अधिक अनुयाई इकट्ठे करना चाहता हुआ उसी प्रकार करे (जैसे अविद्वान अर्थात् भोले भाले अशिक्षित शास्त्राअनुकूल साधना तत्वदर्शी सन्त से प्राप्त करके करते हैं इस प्रकार पाप को प्राप्त नहीं होगा।) 
अध्याय 3 श्लोक 26 का भावार्थ है कि तत्वदर्शी सन्त द्वारा शास्त्राविधि अनुसार साधना प्राप्त अशिक्षित व्यक्ति की बुद्धि में शिक्षित (अक्षर ज्ञान युक्त) व्यक्ति भ्रम उत्पन्न न करे अपितु स्वयं भी शास्त्राअनुसार साधना करे तथा उनको भी प्रोत्साहित करे जैसे परमेश्वर कबीर बन्दी छोड़ जी तत्वदर्शी संत की भूमिका करने के लिए काशी नगर में जुलाहा जाति में प्रकट हुए। लोग उन्हें अशिक्षित अर्थात् अविद्वान मानते थे। परन्तु वे सर्व विद्वानों के विद्वान तथा सर्व भगवानों के भगवान थे। अन्य अशिक्षित व्यक्तियों को शास्त्राविधि अनुसार साधना प्रदान करते थे। अन्य अक्षर ज्ञानयुक्त व्यक्ति (ब्राह्मण) उन मन्दबुद्धि वाले भोले-भाले व्यक्तियों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न कर देते थे कहा करते यह जुलाहा तो अशिक्षित है। यह क्या जाने शास्त्रों के गूढ़ रहस्य को तुम्हारी साधना व्यर्थ है। वे भोले-भाले अशिक्षित विचलित हो जाते थे तथा मार्ग भ्रष्ट होकर जीवन व्यर्थ कर लेते थे। गीता अध्याय 3 श्लोक 26 में यही कहा है कि वह विद्वान (शिक्षित व्यक्ति) यदि जनता को शिष्य रूप में इकट्ठा करना चाहता है तो स्वयं भी शास्त्राअनुसार साधना करे तथा उन भोले भालो से भी करावे। 

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