अध्याय 3 श्लोक 27 से 29 का भावार्थ है कि प्राणी जब तक पूर्ण सन्त की शरण ग्रहण नहीं करता तब तक अपने संस्कार ही प्राप्त करता है। संस्कार का फल तीनों भगवानों (रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव) द्वारा दिया जाता है तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा,सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव) प्रकृति अर्थात् दुर्गा से उत्पन्न है। वह शिक्षित व्यक्ति तत्वज्ञान से अपरिचित होने से मूढ़ कहा जाता है फिर वह अहंकार वश अपने को कर्मों का कर्ता मानता है। अहंकार वश सर्व शास्त्रों को तत्वज्ञानी द्वारा अच्छी तरह समझ कर भी अपने अहंकार युक्त हठ को स्वभाव वश नहीं छोड़ता अर्थात् वास्तविक्ता को आँखों देखकर भी स्वीकार नहीं करता परन्तु तत्वदर्शी सन्त तत्वज्ञान के आधार से प्रत्येक प्रभु की शक्ति से परिचित होकर इन भगवानों व शास्त्रों विरूद्ध साधना पर आसक्त नहीं होता। वे शिक्षित परन्तु तत्वज्ञान से अपरिचित स्वयं तो तीनों प्रभुओं में अपने स्वभाव वश आसक्त रहते हैं उनको चाहिए कि वे उन पूर्णतया न समझने वाले मन्द बुद्धि अर्थात् भोले-भाले अशिक्षितों को पूर्णतय शास्त्र समझ कर भी अहंकार वश सत्य न स्वीकार करने वाले विद्वान अर्थात् शिक्षित जन विचलित न करें। इसलिए उन अशिक्षितों को अध्याय ३ श्लोक 35 में सावधान किया है कि दूसरों की शास्त्राविरूध साधना जो गुण रहित है चाहे कितनी ही तड़क-भड़क वाली व देखने व सुनने में अच्छी हो उसे स्वीकार न करें। अपनी शास्त्रा अनुकूल साधना को मरते दम तक करता रहे। दूसरों की साधना भय उत्पन्न कर देती है जिस कारण मन्द बुद्धि व्यक्ति वास्तविक साधना को त्याग कर गुण रहित धर्म (धार्मिक क्रिया) को स्वीकार कर लेते हैं। जो बहुत हानिकारक होती है।
Sunday, 4 May 2014
शास्त्रा अनुकूल साधना को मरते दम तक करता रहे
अध्याय 3 श्लोक 27 से 29 का भावार्थ है कि प्राणी जब तक पूर्ण सन्त की शरण ग्रहण नहीं करता तब तक अपने संस्कार ही प्राप्त करता है। संस्कार का फल तीनों भगवानों (रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव) द्वारा दिया जाता है तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा,सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव) प्रकृति अर्थात् दुर्गा से उत्पन्न है। वह शिक्षित व्यक्ति तत्वज्ञान से अपरिचित होने से मूढ़ कहा जाता है फिर वह अहंकार वश अपने को कर्मों का कर्ता मानता है। अहंकार वश सर्व शास्त्रों को तत्वज्ञानी द्वारा अच्छी तरह समझ कर भी अपने अहंकार युक्त हठ को स्वभाव वश नहीं छोड़ता अर्थात् वास्तविक्ता को आँखों देखकर भी स्वीकार नहीं करता परन्तु तत्वदर्शी सन्त तत्वज्ञान के आधार से प्रत्येक प्रभु की शक्ति से परिचित होकर इन भगवानों व शास्त्रों विरूद्ध साधना पर आसक्त नहीं होता। वे शिक्षित परन्तु तत्वज्ञान से अपरिचित स्वयं तो तीनों प्रभुओं में अपने स्वभाव वश आसक्त रहते हैं उनको चाहिए कि वे उन पूर्णतया न समझने वाले मन्द बुद्धि अर्थात् भोले-भाले अशिक्षितों को पूर्णतय शास्त्र समझ कर भी अहंकार वश सत्य न स्वीकार करने वाले विद्वान अर्थात् शिक्षित जन विचलित न करें। इसलिए उन अशिक्षितों को अध्याय ३ श्लोक 35 में सावधान किया है कि दूसरों की शास्त्राविरूध साधना जो गुण रहित है चाहे कितनी ही तड़क-भड़क वाली व देखने व सुनने में अच्छी हो उसे स्वीकार न करें। अपनी शास्त्रा अनुकूल साधना को मरते दम तक करता रहे। दूसरों की साधना भय उत्पन्न कर देती है जिस कारण मन्द बुद्धि व्यक्ति वास्तविक साधना को त्याग कर गुण रहित धर्म (धार्मिक क्रिया) को स्वीकार कर लेते हैं। जो बहुत हानिकारक होती है।
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment