गीता अध्याय 3 के श्लोक 30 में कहा है कि अर्जुन अब ज्ञान योग द्वारा मेरे पर आश्रित होकर अर्थात् सर्व धार्मिक कर्मों को मुझ में त्याग कर निःइच्छा, ममता रहित, दुःख त्याग कर युद्ध कर।
विचार करें:-- गीता अध्याय 3 के श्लोक 31,32 का सार है कि जो ऊपर लिखे मेरे मत का अनुसरण करते हैं वे बुरे कर्मों से बच जाते हैं। जो ऐसा नहीं करते वे मूर्ख-अज्ञानी हैं। वे सर्व शास्त्र विरूद्ध ज्ञानों पर आसक्त हैं जो हानिकारक है। उनका पतन निश्चय है। ऊपर लिखे मत (सलाह) से तात्पर्य यह है कि देवी-देवताओं, प्रेतों व पित्रों की पूजा न करके केवल परमात्मा की आराधना करनी चाहिए। यज्ञ व ऊँ नाम का जाप भी निष्काम भाव से अपना मानव कर्तव्य जान कर तथा पूरा गुरु बनाकर शास्त्र अनुकूल करना चाहिए। शिक्षित व्यक्तियों को शास्त्राविधि अनुसार साधना कर रहे अशिक्षितों को भ्रमित नही करना चाहिए अपितु स्वयं भी उसी शास्त्राविधि अनुसार साधना को स्वीकार करके आत्मकल्याण कराना चाहिए।
विचार करें:-- गीता अध्याय 3के श्लोक 33.34में कहा है कि शिक्षित व्यक्ति जो तत्वज्ञान हीन हैं वे मूढ़ स्वभाव वश आँखों देखकर भी सत्य को स्वीकार नहीं करते तथा उन चातुर
(शिक्षित) व्यक्तियों के अनुयाई भी अपने स्वभाववश सत्य को स्वीकार न करके उन चालाक गुरूओं के साथ ही चिपके रहते हैं वे भी मूढ़ हैं। समझाने से भी नहीं मानते। हठ करके भी उन्हें समझाना अति कठिन है। कबीर परमेश्वर से तत्वज्ञान प्राप्त करके सन्त गरीबदास जी महाराज ने कहा है:-
गरीब चातुर प्राणी चोर हैं, मूढ़ मुगध हैं ठोठ।
सन्तों के नहीं काम के इनको दे गल जोट।।
इसी अध्याय ३ के श्लोक 33,34 में यह भी कहा है कि राग द्वेष नहीं करना चाहिए। स्वयं भगवान कृष्ण जी पाण्डवों के राग में महाभारत के युद्ध के दौरान अश्वत्थामा (द्रौणाचार्य के पुत्र) के बारे में युधिष्ठिर से भी झूठ बुलवाई तथा बबरू भान (जिसे श्याम जी भी कहते हैं) का सिर कटवाया कहीं बबरू भान पाण्डवों को पराजित न कर दे। क्योंकि बबरू भान एक बलशाली योद्धा तथा धनुषधारी था जिसने एक ही तीर से पीपल के पेड़ के सभी पत्ते छेद दिए थे और कसम उठा रखी थी कि जो सेना हारती दिखाई देगी उसी के पक्ष में युद्ध करूंगा। कृष्ण जी में प्रवेश काल ने पाण्डवों को विजयी करना था।
एक समय भस्मागिरी ने भगवान शिव को वचन बद्ध करके भस्म कंडा मांग कर शिव को मारना चाहा था। पार्वती को पत्नी बनाने का दुषविचार करके शिव के पीछे भागा तो भगवान श्री विष्णु जी ने शिव जी के राग में पार्वती का रूप बनाया तथा भस्मागिरी को गंडहथ नाच नचा कर भस्म किया।
‘‘गरीब, शिव शंकर के राग में, बहे कृष्ण मुरारी।‘
‘राग द्वेष से भगवान भी नहीं बचे क्योंकि पाण्डवों से राग तो कौरवों से द्वेष तथा शिवजी से राग तो भस्मागिरी से द्वेष स्वयं सिद्ध है। आम प्राणी (अर्जुन) कैसे राग द्वेष से बच सकता है? द्वेष बिना युद्ध हो ही नहीं सकता। इससे सिद्ध है कि गीता जी में ज्ञान तो काल भगवान (ब्रह्म) ने सही दिया परंतु जीव में विकार (काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार, राग-द्वेष तथा शब्द-स्पर्श, रूप, रस, गंध) भर दिए जिनसे परवश होकर भगवान काल के अवतार भी विवश हो गए जिसके कारण काल जाल से नहीं निकल सकते। इसको (काल को) डर बना रहता है कि कहीं जीव तेरे जाल से निकल न जाएं। इसलिए पूर्ण सन्त की शरण ग्रहण करके पूर्ण परमात्मा की भक्ति करो।
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