जो जाग्रत् अवस्था मे विषयों को ग्रहण करता है । जो स्वप्नावस्था मे विषयों की कल्पना कर लेता है । जो सुषुप्ति मे विषयों को विलीन कर लेता है । जो जाग्रत् , स्वप्न , सुषुप्ति , मे ओत प्रोत है जो अवस्थाओं और उपाधियों से अतीत है ये अवस्थाएँऔरउपाधियाँ जिसमे आती जाती रहती हैं जो इनके भाव अभाव का प्रकाशक है वह तुरीय तत्व आत्मा है । आत्माकाश मे देहाभिमान जीव भाव की सृष्टि कर देता है । देहाभिमान के नष्ट होते ही जीवात्मा अपने ब्रह्म स्वरूप मे प्रतिष्ठित हो जाता है । " देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि । यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधयः ।। " जीव को ब्रह्म होने मे उतनी ही देर लगती है जितनी देर ब्राह्मण को मनुष्य होने मे लगती है । ब्राह्मण मनुष्य ही है केवल ब्राह्मणत्व का अभिमान हटाना है इसी प्रकार देहाभिमान हटा देने पर जीव वस्तुतः ब्रह्म ही है
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