Tuesday, 20 May 2014

यही दिव्य चक्षु का स्थान है

दिव्य चक्षु

मनुष्य के चक्षु चार होते हैं - चर्मचक्षु, मनोचक्षु, दिव्य चक्षु और ज्ञान चक्षु।

दिव्य चक्षु का मतलब है ध्यान चक्षु जो निर्विचार अवस्था में व्यक्त होता है। ध्यान चक्षु ही ज्ञान चक्षु का आदि है। जिसका ज्ञान चक्षु विकसित होता है, वही पुरुषोत्तम या बुध्द कहलाता है।

व्यक्ति के शरीर में षट्‌चक्र होते हैं, उनमें छठा चक्र हैं आज्ञा चक्र। यही दिव्य चक्षु का स्थान है अर्थात भ्रूमध्य में ही इसकी स्थिति है। इस ध्यान चक्षु अथवा दिव्य चक्षु को उत्तेजित करने के लिए इसके ज़रा सा नीचे हमारी नाक है जो उसका स्विच है। नाक में बहने वाली हवा पर ध्यान रखना ही स्विच चलाना है। इसी को आनापानसति कहते है। इससे ध्यान चक्षु तुरन्त उत्तेजित होता है। व्यक्ति ‘शिव’ या ‘त्रिनेत्र’ कहलाता है, वह परिपूर्ण दिव्य चक्षु यानी परम योगीश्वर हो जाता है।

धरती पर जन्म लेने वाले प्रत्येक मनुष्य को ‘त्रिनेत्र’ या ‘त्रिलोचन’ होना चाहिए। वही स्वधर्म, स्वराज्य, स्वंतत्रता है और तभी स्वेछा है, स्वयं भू है, स्वयं प्रकाश है।

जब तक अन्धकार का राज्य है हम पराधीन हैं। अब हम जल्दी ध्यानाभ्यास करेंगें। एक पल भी विलम्ब नहीं करेंगें। रास्ता हम समझ चुके हैं, अब गमन करेंगे।

हमारा गम्य (लक्ष्य) है दिव्यचक्षु, रास्ता है आनापानसति और गमन है ध्यान साधना। समस्त भूमण्डल वासियों को ध्यान नेत्र बनाना ही पिरामिड स्पिरिचुअल सोसाइटी के लोगों का एकमात्र लक्ष्य है और एकमात्र वज्र संकल्प भी।

No comments:

Post a Comment