वेद पुराण सभी एक मत होकर यही कहते हैं कि - निराकार निरंजन से प्रेम करो । 33 करोङ देवता । मनुष्य और मुनि सबको निरंजन ने अपने विभिन्न झूठे मतों की डोरी में बाँध रखा है । उसी के झूठे मत से हमने मुक्त होने की आशा की । परन्तु वह हमारी भूल थी । अब हमें सब सही सही रूप से दिखायी दे रहा है । और समझ में आ गया है कि - वह सब दुखदायी यम की काल फ़ाँस ही है ।
तब कबीर साहब बोले - हे जीवों सुनो । यह सब इस काल का धोखा है । इस काल ने विभिन्न मत मतांतरों का फ़ंदा बहुत अधिक फ़ैलाया हुआ है । काल निरंजन ने अनेक कला मतों का प्रदर्शन किया । और जीव को उसमें फ़ँसाने के लिये बहुत ठाठ फ़ैलाया । ( यानी तरह तरह की भोग वासना बनायी ) और सबको तीर्थ वृत यग्य एवं यज्ञादि कर्म कांडो के फ़ंदे में फ़ाँसा । जिससे कोई मुक्त नहीं हो पाता । फ़िर आप शरीर धारण करके प्रकट होता है । और अपनी विशेष महिमा ( अवतार द्वारा ) करवाता है । और नाना प्रकार के गुण कर्म आदि करके सब जीवों को बँधन में बाँध देता है ।
काल निरंजन और अष्टांगी ने जीव को फ़ँसाने के लिये अनेक मायाजाल रचे । वेद शास्त्र पुराण स्मृति आदि के भ्रामक जाल से भयंकर काल ने मुक्ति का रास्ता ही बन्द कर दिया । जीव मनुष्य देह धारण करके भी अपने कल्याण के लिये उसी से आशा करता है । काल निरंजन की शास्त्र आदि मत रूपी कलाएं बहुत भयंकर हैं । और जीव उसके वश में पङे हैं । सत्यनाम के बिना जीव काल का दंड भोगते हैं ।
इस तरह जीवों को बारबार समझाकर मैं सत्यपुरुष के पास गया । और उनको काल द्वारा दिये जा रहे विभिन्न दुखों का वर्णन किया । दयालु सत्यपुरुष तो दया के भंडार और सबके स्वामी हैं । वे जीव के मूल । अभिमान रहित और निष्कामी हैं ।
तब सत्यपुरुष ने बहुत प्रकार से समझाकर कहा । काल के भ्रुम से छुङाने के लिये जीवों को नाम उपदेश से सावधान करो ।
तब कबीर साहब बोले - हे जीवों सुनो । यह सब इस काल का धोखा है । इस काल ने विभिन्न मत मतांतरों का फ़ंदा बहुत अधिक फ़ैलाया हुआ है । काल निरंजन ने अनेक कला मतों का प्रदर्शन किया । और जीव को उसमें फ़ँसाने के लिये बहुत ठाठ फ़ैलाया । ( यानी तरह तरह की भोग वासना बनायी ) और सबको तीर्थ वृत यग्य एवं यज्ञादि कर्म कांडो के फ़ंदे में फ़ाँसा । जिससे कोई मुक्त नहीं हो पाता । फ़िर आप शरीर धारण करके प्रकट होता है । और अपनी विशेष महिमा ( अवतार द्वारा ) करवाता है । और नाना प्रकार के गुण कर्म आदि करके सब जीवों को बँधन में बाँध देता है ।
काल निरंजन और अष्टांगी ने जीव को फ़ँसाने के लिये अनेक मायाजाल रचे । वेद शास्त्र पुराण स्मृति आदि के भ्रामक जाल से भयंकर काल ने मुक्ति का रास्ता ही बन्द कर दिया । जीव मनुष्य देह धारण करके भी अपने कल्याण के लिये उसी से आशा करता है । काल निरंजन की शास्त्र आदि मत रूपी कलाएं बहुत भयंकर हैं । और जीव उसके वश में पङे हैं । सत्यनाम के बिना जीव काल का दंड भोगते हैं ।
इस तरह जीवों को बारबार समझाकर मैं सत्यपुरुष के पास गया । और उनको काल द्वारा दिये जा रहे विभिन्न दुखों का वर्णन किया । दयालु सत्यपुरुष तो दया के भंडार और सबके स्वामी हैं । वे जीव के मूल । अभिमान रहित और निष्कामी हैं ।
तब सत्यपुरुष ने बहुत प्रकार से समझाकर कहा । काल के भ्रुम से छुङाने के लिये जीवों को नाम उपदेश से सावधान करो ।
No comments:
Post a Comment