जब सत्यपुरुष ने जीवों को इस प्रकार पीङित होते देखा । तब उन्हें दया आयी । और उन दया के भंडार स्वामी ने मुझे ( ज्ञानी नाम से ) बुलाया । और बहुत प्रकार से समझाकर कहा - हे ज्ञानी ! तुम जाकर जीवों को चेताओ । तुम्हारे दर्शन से जीव शीतल हो जायेंगे । जाकर उनकी तपन दूर करो ।
हे धर्मदास ! तब सत्यपुरुष की आज्ञा से में वहाँ आया । जहाँ काल निरंजन जीवों को सता रहा था । और दुखी जीव उसके संकेत पर नाच रहे थे ।
हे धर्मदास ! जीव वहाँ दुख से छटपटा रहे थे । और मैं वहाँ जाकर खङा हो गया ।
तब जीवों ने मुझे देखकर पुकारा - हे साहिब ! हमें इस दुख से उबार लो । तम मैंने " सत्य शब्द " पुकारा । और सत्य शब्द का उपदेश किया । और सत्यपुरुष के " सार शब्द " से जीवों को जोङ दिया । तब वे दुख से जलते जीव शान्ति महसूस करने लगे ।
तब सब जीवों ने स्तुति की - हे पुरुष ! आप धन्य हो । आपने हम दुखों से जलते हुओं की तपन बुझायी । हे स्वामी ! आप हमें इस काल निरंजन के जाल से छुङा लो । हे प्रभु ! हम पर दया करो ।
तब मैंने जीवों को समझाया - यदि मैं इस वक्त अपनी शक्ति से तुम्हारा उद्धार करता हूँ । तो सत्यपुरुष का वचन भंग होता है । क्योंकि सत्यपुरुष के वचन अनुसार सद उपदेश द्वारा ही आत्मज्ञान से जीवों का उद्धार करना है । अतः जब तुम यहाँ से जाकर मनुष्य देह धारण करोगे । तब तुम मेरे शब्द उपदेश को विश्वास से गृहण करना । जिससे तुम्हारा उद्धार होगा । उस समय मैं सत्यपुरुष के नाम सुमरन की सही विधि और सार शब्द का उपदेश करूँगा । तब तुम विवेकी होकर सत्यलोक जाओगे । और सदा के लिये काल निरंजन के बँधन से मुक्त हो जाओगे ।
जो कोई भी मन वचन कर्म से सुमरन करता है । और जहाँ अपनी आशा रखता है । वहाँ उसका वास होता है । अतः संसार में जाकर देह धारण कर जिसकी आशा करोगे । और उस समय यदि तुम सत्यपुरुष को भूल गये । तो काल निरंजन तुमको धरकर खा जायेगा ।
तब जीव बोले - हे पुरातन पुरुष ! सुनो मनुष्य देह धारण करके ( माया रचित वासनाओं में फ़ँसकर ) यह ज्ञान भूल ही जाता है । अतः याद नहीं रहता । पहले हमने सत्यपुरुष जानकर काल निरंजन का सुमरन किया कि - वही सब कुछ है ।
हे धर्मदास ! तब सत्यपुरुष की आज्ञा से में वहाँ आया । जहाँ काल निरंजन जीवों को सता रहा था । और दुखी जीव उसके संकेत पर नाच रहे थे ।
हे धर्मदास ! जीव वहाँ दुख से छटपटा रहे थे । और मैं वहाँ जाकर खङा हो गया ।
तब जीवों ने मुझे देखकर पुकारा - हे साहिब ! हमें इस दुख से उबार लो । तम मैंने " सत्य शब्द " पुकारा । और सत्य शब्द का उपदेश किया । और सत्यपुरुष के " सार शब्द " से जीवों को जोङ दिया । तब वे दुख से जलते जीव शान्ति महसूस करने लगे ।
तब सब जीवों ने स्तुति की - हे पुरुष ! आप धन्य हो । आपने हम दुखों से जलते हुओं की तपन बुझायी । हे स्वामी ! आप हमें इस काल निरंजन के जाल से छुङा लो । हे प्रभु ! हम पर दया करो ।
तब मैंने जीवों को समझाया - यदि मैं इस वक्त अपनी शक्ति से तुम्हारा उद्धार करता हूँ । तो सत्यपुरुष का वचन भंग होता है । क्योंकि सत्यपुरुष के वचन अनुसार सद उपदेश द्वारा ही आत्मज्ञान से जीवों का उद्धार करना है । अतः जब तुम यहाँ से जाकर मनुष्य देह धारण करोगे । तब तुम मेरे शब्द उपदेश को विश्वास से गृहण करना । जिससे तुम्हारा उद्धार होगा । उस समय मैं सत्यपुरुष के नाम सुमरन की सही विधि और सार शब्द का उपदेश करूँगा । तब तुम विवेकी होकर सत्यलोक जाओगे । और सदा के लिये काल निरंजन के बँधन से मुक्त हो जाओगे ।
जो कोई भी मन वचन कर्म से सुमरन करता है । और जहाँ अपनी आशा रखता है । वहाँ उसका वास होता है । अतः संसार में जाकर देह धारण कर जिसकी आशा करोगे । और उस समय यदि तुम सत्यपुरुष को भूल गये । तो काल निरंजन तुमको धरकर खा जायेगा ।
तब जीव बोले - हे पुरातन पुरुष ! सुनो मनुष्य देह धारण करके ( माया रचित वासनाओं में फ़ँसकर ) यह ज्ञान भूल ही जाता है । अतः याद नहीं रहता । पहले हमने सत्यपुरुष जानकर काल निरंजन का सुमरन किया कि - वही सब कुछ है ।
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