सदगुरु के सत्य शब्द उपदेश बिना जीव सांसारिक कलेश काम क्रोध शोक मोह चिंता आदि से नहीं बच सकता । सदगुरु के नाम बिना वह यमरूपी काल के मुँह में ही जायेगा । और बहुत से दुखों को भोगेगा । वास्तव में जीव काल निरंजन का भय मानकर ही पुण्य कमाता है । थोङे फ़ल से..धन संपत्ति आदि से उसकी भूख शान्त नहीं होती ।
जब तक जीव सत्यपुरुष से डोर नहीं जोङता । सदगुरु से ( हँस ) दीक्षा लेकर भक्ति नहीं करता । तब तक 84 लाख योनियों में बारबार आता जाता रहेगा । यह काल निरंजन अपनी असीम कला जीव पर लगाता है । और उसे भरमाता है । जिससे जीव सत्यपुरुष का भेद नहीं जान पाता ।
लाभ के लिये जीव लोभवश शास्त्र में बताये कर्मों की और दौङता फ़िरता है । और उससे फ़ल पाने की आशा करता है । इस प्रकार जीव को झूठी आशा बँधाकर काल धरकर खा जाता है । काल निरंजन की चालाकी कोई पहचान नहीं पाता । और काल निरंजन शास्त्रों द्वारा पाप पुण्य के कर्मों से स्वर्ग नरक की प्राप्ति और विषय भोगों की आशा बँधाकर जीव को 84 लाख योनियों में नचाता है ।
पहले सतयुग में इस काल निरंजन का यह व्यवहार था कि वह जीवों को लेकर आहार करता था । वह एक लाख जीव नित्य खाता था । ऐसा महान और अपार बलशाली काल निरंजन कसाई है । वहाँ रात दिन तप्तशिला जलती थी । काल निरंजन जीवों को पकङकर उस पर धरता था । उस तप्तशिला पर उन जीवों को जलाता था । और बहुत दुख देता था । फ़िर वह उन्हें 84 में डाल देता था ।
उसके बाद जीवों को तमाम योनियों में भरमाता भटकाता था । इस प्रकार काल निरंजन जीवों को अनेक प्रकार के बहुत से कष्ट देता था । तब अनेकानेक जीवों ने अनेक प्रकार से दुखी होकर पुकारा कि - काल निरंजन हम जीवों को अपार कष्ट दे रहा है । इस यम काल का दिया हुआ कष्ट हमसे सहा नहीं जाता । हे सदगुरु ! हमारी सहायता करो । आप हमारी रक्षा करो ।
जब तक जीव सत्यपुरुष से डोर नहीं जोङता । सदगुरु से ( हँस ) दीक्षा लेकर भक्ति नहीं करता । तब तक 84 लाख योनियों में बारबार आता जाता रहेगा । यह काल निरंजन अपनी असीम कला जीव पर लगाता है । और उसे भरमाता है । जिससे जीव सत्यपुरुष का भेद नहीं जान पाता ।
लाभ के लिये जीव लोभवश शास्त्र में बताये कर्मों की और दौङता फ़िरता है । और उससे फ़ल पाने की आशा करता है । इस प्रकार जीव को झूठी आशा बँधाकर काल धरकर खा जाता है । काल निरंजन की चालाकी कोई पहचान नहीं पाता । और काल निरंजन शास्त्रों द्वारा पाप पुण्य के कर्मों से स्वर्ग नरक की प्राप्ति और विषय भोगों की आशा बँधाकर जीव को 84 लाख योनियों में नचाता है ।
पहले सतयुग में इस काल निरंजन का यह व्यवहार था कि वह जीवों को लेकर आहार करता था । वह एक लाख जीव नित्य खाता था । ऐसा महान और अपार बलशाली काल निरंजन कसाई है । वहाँ रात दिन तप्तशिला जलती थी । काल निरंजन जीवों को पकङकर उस पर धरता था । उस तप्तशिला पर उन जीवों को जलाता था । और बहुत दुख देता था । फ़िर वह उन्हें 84 में डाल देता था ।
उसके बाद जीवों को तमाम योनियों में भरमाता भटकाता था । इस प्रकार काल निरंजन जीवों को अनेक प्रकार के बहुत से कष्ट देता था । तब अनेकानेक जीवों ने अनेक प्रकार से दुखी होकर पुकारा कि - काल निरंजन हम जीवों को अपार कष्ट दे रहा है । इस यम काल का दिया हुआ कष्ट हमसे सहा नहीं जाता । हे सदगुरु ! हमारी सहायता करो । आप हमारी रक्षा करो ।
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