<<<<‘‘ब्रह्म(ज्योति निरंजन -- काल) साधना से जन्म-मरण समाप्त नहीं होता‘‘>>>>
अध्याय 2 के श्लोक 10 से 16 में वर्णन है कि अर्जुन को दुःख में ग्रस्त देख कर मुस्कराते हुए भगवान बोले कि हे अर्जुन शोक न करने वाली बात का शोक कर रहा है तथा ज्ञान कह रहा है पंडितों जैसा। विद्धान लोग मरने जीने की चिंता नहीं करते। यह नहीं है कि हम तुम और ये सभी सैनिक पहले कभी नहीं थे या आगे न होंगे। इसलिए दुःख-सुख सहन करने की हिम्मत रख और हम तुम सब जन्म-मरण में ही हैं।
अध्याय 2 के श्लोक 17 का भावार्थ है कि गीता ज्ञान दाता काल भगवान कह रहा है कि अर्जुन हम सब (मैं और तू तथा सर्व प्राणी) जन्म-मरण में हैं। वास्तव में अविनाशी तो उसी परमेश्वर (पूर्ण ब्रह्म) को ही जान जिससे यह सर्व ब्रह्मण्ड व्याप्त (व्यवस्थित) है । उस अविनाशी (सतपुरुष) का कोई नाश नहीं कर सकता। उसी की शक्ति प्रत्येक जीव में और कण-2 में विद्यमान है। जैसे सूर्य दूर स्थान पर होते हुए भी उसका प्रकाश व उष्णता पथ्वी पर प्रभाव बनाए हुए है।.जैसे सौर ऊर्जा के संयन्त्रा को शक्ति दूरस्थ सूर्य से प्राप्त होती है। उस संयन्त्रा से जुड़े सर्व, पंखें, व प्रकाश करने वाले बल्ब आदि कार्य करते रहते हैं। इसी प्रकार पूर्ण परमात्मा सत्यलोक में दूर विराजमान होकर सर्व प्राणियों की आत्मा रूपी संयन्त्रा को शक्ति प्रदान कर रहा है। उसी की शक्ति से सर्व प्राणी व भूगोल गति कर रहे हैं। जिन शास्त्राविरूद्ध साधकों को परमात्मा का लाभ प्राप्त नहीं हो रहा उनके अन्तकरण पर पाप कर्मों के बादल छाए होते हैं। सतगुरू शरण में आने के पश्चात् सत्य साधना (शास्त्र विधि अनुसार) करने से वे पाप कर्मों के बादल समाप्त हो जाते हैं। जिस कारण से पूर्ण सन्त की शरण में रह कर मर्यादावत् साधना करने से परमात्मा से मिलने वाली शक्ति प्रारम्भ हो जाती है।
कबीर परमेश्वर के शिष्य गरीबदास जी ने कहा है ::-
जैसे सूरज के आगे बदरा ऐसे कर्म छया रे।
प्रेम की पवन करे चित मन्जन झल्के तेज नया रे।।
सरलार्थ:-- जैसे सूर्य के सामने बादल होते है ऐसे पाप कर्मों की छाया जीव व परमात्मा के मध्य हो जाती है। पूर्ण सन्त की शरण में शास्त्राविधि अनुसार साधना करने से प्रभु की भक्ति रूपी मन्जन से प्रभु प्रेम रूपी हवा चलने से पाप कर्म रूपी बादल हट कर नई शक्ति की चमक दिखाई देती है। अर्थात् परमात्मा से मिलने वाला लाभ प्रारम्भ हो जाता है। यही प्रमाण गीता अध्याय 18 श्लोक 61 में है कि पूर्ण परमात्मा प्रत्येक प्राणी को यन्त्रा (मशीन) की तरह चलाता है। जैसे पानी के भरे मटकों में सूर्य प्रत्येक में दिखाई देता है। ऐसे परमात्मा जीव के हृदय में दिखाई देता है। अध्याय 2 के श्लोक 18 का अनुवाद है कि यह पंच भौतिक शरीर नाशवान है। अविनाशी परमात्मा नाश रहित, प्रमाण रहित अर्थात् आम साधक नहीं समझ सकता, जीव आत्मा के साथ नित्य रहने वाला कहा गया है। जैसे उपरोक्त उदाहरण में सूर्य, सौर ऊर्जा संयन्त्र से अभेद रहता है उसी की शक्ति से ऊर्जा ग्रहण हो रही है। जिसे वैज्ञानिक ही जानते हैं। आम व्यक्ति नहीं समझ सकता की ये सर्व पंखे आदि कैसे कार्य कर रहे हैं। ख् गीता जी के अध्याय 13 के श्लोक 21.22.23 में और गीता जी के अध्याय 15 के श्लोक 8 में , इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन! युद्ध कर।
अध्याय 13 के श्लोक 21 का अनुवाद: प्रकति में स्थित ही पुरुष अर्थात् परमात्मा प्रकति से उत्पन्न त्रिगुणात्मक भोगता है और इन गुणोंका संग ही इस जीवात्माके अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म
लेनेका कारण है। जैसे सौर ऊर्जा का प्रयोग कोई पशु काटने की मशीन चलाने में प्रयोग करता है कोई जूस (रस) निकालने की मशीन चलाने में प्रयोग करता है। यह सर्व कार्य सौर ऊर्जा से ही होता है। इसी प्रकार परमात्मा की शक्ति युक्त साधक उसका जैसा प्रयोग करता है व श्रेय परमात्मा के गुण अर्थात् शक्ति को ही जाता है।
अध्याय 13 के श्लोक 22 का अनुवाद: इस देह में स्थित यह सतपुरुष वास्तव में परमात्मा ही है वही साक्षी होने से उपद्रष्टा और यथार्थ संमति देने वाला होनेसे अनुमन्ता, सबका धारण-पोषण करनेवाला होने से भर्ता, जीवरूपसे भोक्ता ब्रह्म व परब्रह्म आदिका भी स्वामी होनेसे महेश्वर और परमात्मा ऐसा कहा गया है।
अध्याय 13 के श्लोक 23 का अनुवाद: इस प्रकार सतपुरुष को, काल भगवानको और गुणोंके सहित मायाको जो तत्वसे जानता है वह सब प्रकारसे कर्तव्य कर्म करता हुआ भी फिर नहीं जन्मता।
अध्याय 2 के श्लोक 10 से 16 में वर्णन है कि अर्जुन को दुःख में ग्रस्त देख कर मुस्कराते हुए भगवान बोले कि हे अर्जुन शोक न करने वाली बात का शोक कर रहा है तथा ज्ञान कह रहा है पंडितों जैसा। विद्धान लोग मरने जीने की चिंता नहीं करते। यह नहीं है कि हम तुम और ये सभी सैनिक पहले कभी नहीं थे या आगे न होंगे। इसलिए दुःख-सुख सहन करने की हिम्मत रख और हम तुम सब जन्म-मरण में ही हैं।
अध्याय 2 के श्लोक 17 का भावार्थ है कि गीता ज्ञान दाता काल भगवान कह रहा है कि अर्जुन हम सब (मैं और तू तथा सर्व प्राणी) जन्म-मरण में हैं। वास्तव में अविनाशी तो उसी परमेश्वर (पूर्ण ब्रह्म) को ही जान जिससे यह सर्व ब्रह्मण्ड व्याप्त (व्यवस्थित) है । उस अविनाशी (सतपुरुष) का कोई नाश नहीं कर सकता। उसी की शक्ति प्रत्येक जीव में और कण-2 में विद्यमान है। जैसे सूर्य दूर स्थान पर होते हुए भी उसका प्रकाश व उष्णता पथ्वी पर प्रभाव बनाए हुए है।.जैसे सौर ऊर्जा के संयन्त्रा को शक्ति दूरस्थ सूर्य से प्राप्त होती है। उस संयन्त्रा से जुड़े सर्व, पंखें, व प्रकाश करने वाले बल्ब आदि कार्य करते रहते हैं। इसी प्रकार पूर्ण परमात्मा सत्यलोक में दूर विराजमान होकर सर्व प्राणियों की आत्मा रूपी संयन्त्रा को शक्ति प्रदान कर रहा है। उसी की शक्ति से सर्व प्राणी व भूगोल गति कर रहे हैं। जिन शास्त्राविरूद्ध साधकों को परमात्मा का लाभ प्राप्त नहीं हो रहा उनके अन्तकरण पर पाप कर्मों के बादल छाए होते हैं। सतगुरू शरण में आने के पश्चात् सत्य साधना (शास्त्र विधि अनुसार) करने से वे पाप कर्मों के बादल समाप्त हो जाते हैं। जिस कारण से पूर्ण सन्त की शरण में रह कर मर्यादावत् साधना करने से परमात्मा से मिलने वाली शक्ति प्रारम्भ हो जाती है।
कबीर परमेश्वर के शिष्य गरीबदास जी ने कहा है ::-
जैसे सूरज के आगे बदरा ऐसे कर्म छया रे।
प्रेम की पवन करे चित मन्जन झल्के तेज नया रे।।
सरलार्थ:-- जैसे सूर्य के सामने बादल होते है ऐसे पाप कर्मों की छाया जीव व परमात्मा के मध्य हो जाती है। पूर्ण सन्त की शरण में शास्त्राविधि अनुसार साधना करने से प्रभु की भक्ति रूपी मन्जन से प्रभु प्रेम रूपी हवा चलने से पाप कर्म रूपी बादल हट कर नई शक्ति की चमक दिखाई देती है। अर्थात् परमात्मा से मिलने वाला लाभ प्रारम्भ हो जाता है। यही प्रमाण गीता अध्याय 18 श्लोक 61 में है कि पूर्ण परमात्मा प्रत्येक प्राणी को यन्त्रा (मशीन) की तरह चलाता है। जैसे पानी के भरे मटकों में सूर्य प्रत्येक में दिखाई देता है। ऐसे परमात्मा जीव के हृदय में दिखाई देता है। अध्याय 2 के श्लोक 18 का अनुवाद है कि यह पंच भौतिक शरीर नाशवान है। अविनाशी परमात्मा नाश रहित, प्रमाण रहित अर्थात् आम साधक नहीं समझ सकता, जीव आत्मा के साथ नित्य रहने वाला कहा गया है। जैसे उपरोक्त उदाहरण में सूर्य, सौर ऊर्जा संयन्त्र से अभेद रहता है उसी की शक्ति से ऊर्जा ग्रहण हो रही है। जिसे वैज्ञानिक ही जानते हैं। आम व्यक्ति नहीं समझ सकता की ये सर्व पंखे आदि कैसे कार्य कर रहे हैं। ख् गीता जी के अध्याय 13 के श्लोक 21.22.23 में और गीता जी के अध्याय 15 के श्लोक 8 में , इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन! युद्ध कर।
अध्याय 13 के श्लोक 21 का अनुवाद: प्रकति में स्थित ही पुरुष अर्थात् परमात्मा प्रकति से उत्पन्न त्रिगुणात्मक भोगता है और इन गुणोंका संग ही इस जीवात्माके अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म
लेनेका कारण है। जैसे सौर ऊर्जा का प्रयोग कोई पशु काटने की मशीन चलाने में प्रयोग करता है कोई जूस (रस) निकालने की मशीन चलाने में प्रयोग करता है। यह सर्व कार्य सौर ऊर्जा से ही होता है। इसी प्रकार परमात्मा की शक्ति युक्त साधक उसका जैसा प्रयोग करता है व श्रेय परमात्मा के गुण अर्थात् शक्ति को ही जाता है।
अध्याय 13 के श्लोक 22 का अनुवाद: इस देह में स्थित यह सतपुरुष वास्तव में परमात्मा ही है वही साक्षी होने से उपद्रष्टा और यथार्थ संमति देने वाला होनेसे अनुमन्ता, सबका धारण-पोषण करनेवाला होने से भर्ता, जीवरूपसे भोक्ता ब्रह्म व परब्रह्म आदिका भी स्वामी होनेसे महेश्वर और परमात्मा ऐसा कहा गया है।
अध्याय 13 के श्लोक 23 का अनुवाद: इस प्रकार सतपुरुष को, काल भगवानको और गुणोंके सहित मायाको जो तत्वसे जानता है वह सब प्रकारसे कर्तव्य कर्म करता हुआ भी फिर नहीं जन्मता।
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