Sunday, 4 May 2014

वे जल्दी प्रकट हो कर उन्हें कुछ राहत दे देते हैं

**।। पूर्ण ज्ञानी काल जाल में नहीं रहते।।**

अध्याय 4 के श्लोक 10 से 15 में काल भगवान कह रहे हैं कि जिनके राग द्वेष मर गए हैं जिसने मुझे यहाँ 21 ब्रह्मण्ड के कर्मों का कत्र्ता तथा मालिक हूँ, ऐसे तत्व से जान लिया है। वह मतावलम्बी हो चुके हैं। {नोट:- वे तीनों मंत्रों के उपासक कबीर हंस हैं जो सत्यनाम व सारनाम सुमरण करके काल के यथार्थ स्वरूप को देख कर उसके सिर पर पैर रख कर पार (सतलोक में चले जाते हैं) हो जाते हैं।} जैसे गीता अध्याय 7 श्लोक 17 में कहा है कि ज्ञानी मुझे अच्छे लगते हैं तथा मैं ज्ञानी को प्रिय हूँ। क्योंकि वे तीनों गुणों (रजगुण ब्रह्मा जी, सतगुण विष्णु जी, तमगुण शिव जी) की उपासना न करके मेरी भक्ति करते हैं, इसी प्रकार यहाँ गीता अध्याय 4 श्लोक 11 में कहा है कि जो मुझे भजते हैं मैं उन्हें भजता हूँ अर्थात् मुझे अच्छे लगते हैं क्योंकि वे कभी तत्वदर्शी संत से मिलते ही तुरन्त सत्य साधना करने लग जाते हैं, इसी का प्रमाण गीता अध्याय 16 व 17 में विस्तृत है। फिर कहा है कि जो मुझे अच्छी तरह जान लेता है वह फिर मेरे जाल में नहीं फँसता है तथा जो देवताओं (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) की साधना करते हैं वे जल्दी प्रकट हो कर उन्हें कुछ राहत दे देते हैं परंतु पूर्ण मुक्त नहीं कर सकते। इसलिए तू अपने पूर्वजों की तरह शास्त्रानुकूल भक्ति कर्म कर।

No comments:

Post a Comment