कैलाश पर देवाधिदेव अपनी समाधि में हैं। हठात उनका चित्त बरबस ही नन्दनन्दन की ओर आकर्षित हो गया। स्वरुपों में कोई भेद नहीं सो उन्हें ज्ञात हो गया कि श्रीधामवृन्दावन में शरद पूर्णिमा को महारास होगा। विरक्त महादेव व्याकुल हो उठे अपने स्वामी की इस अदभुत लीला को देखने के लिये। उन्होंने नेत्र खोल दिये। ह्रदय में जो था अब उसे प्रत्यक्ष देखने को नेत्र उत्सुक हैं, लालायित हैं। न जाने फ़िर कब श्रीहरि की ऐसी लीला देखने को मिले। व्याकुल चित्त के भाव मुख पर आ गये। देवी पार्वती, स्वामी के मुख को देखकर उनकी अन्यमयस्कता का भेद जान गयीं और उनके अधरों पर भी मधुर मुस्कान नृत्य करने लगी। देवाधिदेव ने माँ पार्वती की ओर स्मित हास्य से परिपूर्ण दृष्टी डाली मानो कह रहे हों, चलें अपने प्रभु की इस अनोखी लीला का आनन्द लेने। देवी ने स्वीकृति में मस्तक हिला दिया। कैलाश पर मौन ही बोलता है। सब एक ही रुप हैं सो किसके ह्रदय में क्या भाव उठ रहे हैं, सब देखकर ही समझ लेते हैं। चल दिये देवाधिदेव। चलना कहाँ था, उनके तो संकल्प मात्र से सब चलता है सो आ गये श्रीधाम की सीमा के बाहर। श्रीधाम की सीमा पर खड़े होकर झुककर ब्रजरज उठायी और अपने मस्तक पर, मुख पर लेपन कर लिया। श्रीधाम में प्रवेश करने को जैसे ही अपना पग बढ़ाया तो देखा कि श्रीललिता सखी किंचित हास्य के साथ उन्हें हाथ से संकेत कर रही हैं कि -"देवाधिदेव ! प्रणाम स्वीकार हो परन्तु श्रीधाम में प्रवेश न मिल सकेगा।" महादेव अधीर हो उठे -"ललिते ! चित्त व्याकुल हो रहा है। नेत्रों को अब उस सांवरे को देखे बिना धीरज न बँधेगा। जाने दो न ! अपने स्वामी से मिल लेने दो, उन्हें जी भर के देख लेने दो।"
प्रभो ! देवी तो प्रवेश कर सकती हैं परन्तु आप नहीं ! महादेवी आप वंशीवट पधारें।" महादेवी ने कनखियों से भोलेनाथ को देखा और मुस्कराते हुए चली गयीं। देवाधिदेव सब समझ रहे हैं सांवरे की लीला ! चित्त मेरा व्याकुल और प्रवेश मिला महादेवी को ! प्रभो ! जैसी तुम्हारी इच्छा ! मेरे साथ भी लीला करना चाहते हो सो ऐसा ही सही।
"ललिते ! तुम सहायता करो, कैसे प्रवेश मिलेगा।"
"हे चन्दशेखर ! श्रीधाम में "पुरुष" का प्रवेश नहीं है। यह तो गोपियों का भाव-राज्य है जिसकी अधीश्वरी श्रीकिशोरीजी हैं सो पुरुष-भाव त्यागकर गोपी बने बिना प्रवेश संभव नहीं है।"
लीलाधर को आज अपने परम भक्त, परम वैष्णव से छेड़छाड़ की सूझी है;जब मोहिनी रुप धरा था तब भी तुमने खूब दौड़ाया था, आज फ़िर ऐसा ही सही। महादेव की स्वीकारोक्ति पर श्रीललिताजी ने श्रीयमुना महारानी को यह दायित्व सौंपा कि वह उन्हें गोपीवेश धारण कराकर वंशीवट महारास-स्थल पर ले आवें। श्रीयमुनाजी ने देवाधिदेव को यमुना-स्नान के उपरान्त गोपीवेश धारण करने में सहायता की। छ्द्मगोपी ने वेश तो धारण कर लिया पर अपनी जटाओं और दाड़ी को कैसे छुपाये सो एक हाथ लंबा घूँघट काढ़ लिया और चल दी श्रीयमुनाजी के साथ वंशीवट-यमुना-पुलिन पर। मार्ग में सखियाँ श्रीयमुनाजी से पूछती हैं कि-"अरी सखी ! जे कौन है और जा गोपीने इत्तो बड़ो घूँघट चौं काढ़ रख्यो है ?" श्रीयमुनाजी ने प्रतिउत्तर दिया - "जाकी सास नाँय आमन दै रही हती सो छुपायकै लाई हूँ।" देवाधिदेव घूँघट के भीतर मुस्करा रहे है, मोहन ! आज तुम जो न दिखाय दो सोई कम है।
वंशीवट में रास आरम्भ हो चुका था। गोपियों के साथ मदनमोहन वंशीवादन करते हुए नृत्य कर रहे हैं। आत्मा और परमात्मा का महारास हो रहा है। अंश, अंशी से मिल रहा है। करोड़ों जन्मों की ऋषि-मुनियों की साध पूरी हो रही है। आनन्द की उत्ताल तरंगे उठ रही हैं। श्यामसुन्दर की त्रैलोक्यमोहिनी लीला हो रही है। अचानक ललिता सखी ने छद्मगोपी [देवाधिदेव] का हाथ पकड़कर मुस्कराते हुए चित्तचोर के हाथ में पकड़ा दिया। चित्तचोर नटवरनागर ने भी गोपी के हाथ को कसकर पकड़कर मानो संकेत दिया कि स्वागत है चन्दमौलीश्वर ! वंशीवादन और स्वामी के साहचर्य में महादेव सुध-बुध खो रहे हैं। नटराज स्वयं मोहित हो रहे हैं। वंशीवादन और गोपियों के पायल के घूँघरुओं की रुनझुन यमुना-पुलिन पर एक दिव्य भाव-राज्य की सृष्टी कर रही है। घूँघट में छिपे श्मशानवासी, महाविरक्त एक दुर्लभ भाव में आसक्त हुए जा रहे हैं। जिनके डमरु से शब्द-संरचना हुयी है, जो समस्त तंत्र-मंत्रों के जनक हैं, वे सांवरे के मोहन-पाश में बँधे इतने बेसुध हो गये कि अब छद्मवेश का भी स्मरण न रहा और घूँघट खोल दिया। नेत्र उस भुवन-मोहिनी सौन्दर्य को पीकर मानो कंठ में विराज रहे हलाहल को शांत करना चाहते हैं। श्यामसुन्दर ने भुज-पाश में बाँध लिया। मोहन का भक्त बहुत देर तक छिपा रहे, यह संभव ही नहीं। श्यामसुन्दर छेड़छाड़ किये बिना मानते भी तो नहीं, यही तो उनका स्वभाव है। भक्त अपने प्रभु को प्रकट कर देता है और प्रभु अपने भक्त को प्रकट कर देते हैं ताकि सबको संदेश जा सके कि "यह मेरा प्रिय है।" नन्दनन्दन ने संकेत से महादेवी को बुलाकर देवाधिदेव का हाथ उन्हें सौंपते हुए, उनकी दाड़ी पर हाथ फ़ेरते हुए कहा-"गोपेश्वर की जय।"
नारायण ब्रजभूमि कौं, को न नवावै माथ।
जहाँ आप गोपी भये, श्रीगोपेश्वरनाथ ॥
प्रभो ! देवी तो प्रवेश कर सकती हैं परन्तु आप नहीं ! महादेवी आप वंशीवट पधारें।" महादेवी ने कनखियों से भोलेनाथ को देखा और मुस्कराते हुए चली गयीं। देवाधिदेव सब समझ रहे हैं सांवरे की लीला ! चित्त मेरा व्याकुल और प्रवेश मिला महादेवी को ! प्रभो ! जैसी तुम्हारी इच्छा ! मेरे साथ भी लीला करना चाहते हो सो ऐसा ही सही।
"ललिते ! तुम सहायता करो, कैसे प्रवेश मिलेगा।"
"हे चन्दशेखर ! श्रीधाम में "पुरुष" का प्रवेश नहीं है। यह तो गोपियों का भाव-राज्य है जिसकी अधीश्वरी श्रीकिशोरीजी हैं सो पुरुष-भाव त्यागकर गोपी बने बिना प्रवेश संभव नहीं है।"
लीलाधर को आज अपने परम भक्त, परम वैष्णव से छेड़छाड़ की सूझी है;जब मोहिनी रुप धरा था तब भी तुमने खूब दौड़ाया था, आज फ़िर ऐसा ही सही। महादेव की स्वीकारोक्ति पर श्रीललिताजी ने श्रीयमुना महारानी को यह दायित्व सौंपा कि वह उन्हें गोपीवेश धारण कराकर वंशीवट महारास-स्थल पर ले आवें। श्रीयमुनाजी ने देवाधिदेव को यमुना-स्नान के उपरान्त गोपीवेश धारण करने में सहायता की। छ्द्मगोपी ने वेश तो धारण कर लिया पर अपनी जटाओं और दाड़ी को कैसे छुपाये सो एक हाथ लंबा घूँघट काढ़ लिया और चल दी श्रीयमुनाजी के साथ वंशीवट-यमुना-पुलिन पर। मार्ग में सखियाँ श्रीयमुनाजी से पूछती हैं कि-"अरी सखी ! जे कौन है और जा गोपीने इत्तो बड़ो घूँघट चौं काढ़ रख्यो है ?" श्रीयमुनाजी ने प्रतिउत्तर दिया - "जाकी सास नाँय आमन दै रही हती सो छुपायकै लाई हूँ।" देवाधिदेव घूँघट के भीतर मुस्करा रहे है, मोहन ! आज तुम जो न दिखाय दो सोई कम है।
वंशीवट में रास आरम्भ हो चुका था। गोपियों के साथ मदनमोहन वंशीवादन करते हुए नृत्य कर रहे हैं। आत्मा और परमात्मा का महारास हो रहा है। अंश, अंशी से मिल रहा है। करोड़ों जन्मों की ऋषि-मुनियों की साध पूरी हो रही है। आनन्द की उत्ताल तरंगे उठ रही हैं। श्यामसुन्दर की त्रैलोक्यमोहिनी लीला हो रही है। अचानक ललिता सखी ने छद्मगोपी [देवाधिदेव] का हाथ पकड़कर मुस्कराते हुए चित्तचोर के हाथ में पकड़ा दिया। चित्तचोर नटवरनागर ने भी गोपी के हाथ को कसकर पकड़कर मानो संकेत दिया कि स्वागत है चन्दमौलीश्वर ! वंशीवादन और स्वामी के साहचर्य में महादेव सुध-बुध खो रहे हैं। नटराज स्वयं मोहित हो रहे हैं। वंशीवादन और गोपियों के पायल के घूँघरुओं की रुनझुन यमुना-पुलिन पर एक दिव्य भाव-राज्य की सृष्टी कर रही है। घूँघट में छिपे श्मशानवासी, महाविरक्त एक दुर्लभ भाव में आसक्त हुए जा रहे हैं। जिनके डमरु से शब्द-संरचना हुयी है, जो समस्त तंत्र-मंत्रों के जनक हैं, वे सांवरे के मोहन-पाश में बँधे इतने बेसुध हो गये कि अब छद्मवेश का भी स्मरण न रहा और घूँघट खोल दिया। नेत्र उस भुवन-मोहिनी सौन्दर्य को पीकर मानो कंठ में विराज रहे हलाहल को शांत करना चाहते हैं। श्यामसुन्दर ने भुज-पाश में बाँध लिया। मोहन का भक्त बहुत देर तक छिपा रहे, यह संभव ही नहीं। श्यामसुन्दर छेड़छाड़ किये बिना मानते भी तो नहीं, यही तो उनका स्वभाव है। भक्त अपने प्रभु को प्रकट कर देता है और प्रभु अपने भक्त को प्रकट कर देते हैं ताकि सबको संदेश जा सके कि "यह मेरा प्रिय है।" नन्दनन्दन ने संकेत से महादेवी को बुलाकर देवाधिदेव का हाथ उन्हें सौंपते हुए, उनकी दाड़ी पर हाथ फ़ेरते हुए कहा-"गोपेश्वर की जय।"
नारायण ब्रजभूमि कौं, को न नवावै माथ।
जहाँ आप गोपी भये, श्रीगोपेश्वरनाथ ॥
No comments:
Post a Comment