Thursday, 8 May 2014

सबको ठाकुरजी की प्रतीक्षा है

आज अचानक, संभवत: ५ वर्ष पूर्व घटी एक घटना की स्मृति सजीव हो उठी। ह्रदय आनन्दातिरेक से भर उठा। गोपाष्टमी का पर्व था और नन्दगाँव से स्नेह भरा आमन्त्रण भी था कि गोपाष्टमी की लीला में सम्मिलित होना है। श्रीकिशोरीजी की कृपा रही और मध्यान्ह तक नन्दगाँव में नन्दलाल की गौचारण-भूमि, टेर-कदंब पहुँच गये। गोपाष्टमी को नन्दगाँव में बड़ा भारी उत्सव होता है। गोस्वामी बालकों में से दो स्वरुप चुने जाते हैं और उनका श्रीकृष्ण और बलदाऊ के स्वरुप में श्रृंगार होता है और इसके बाद दोनों ही नन्दगाँव के प्रत्येक गृह को जाकर पवित्र करते हैं और नन्दगाँव वासी अपने दोनों प्यारे लालाओं की आरती उतारते हैं और मंगल-कामना करते हैं क्योंकि आज नन्दजू के लड़ैते वन कूँ जावैंगे, गैया चरायवे कूँ। मध्यान्ह तक नन्दगाँव में मिलकै श्रीठाकुरजी, दाऊजी और अपने प्रिय ग्वाल-बालन के संग गौचारण-भूमि, टेर-कदंब पै आवैं, आसेश्वर महादेवजी के पास। टेर-कदंब, नन्दगाँव से २-३ किलोमीटर है और आज तो श्रीठाकुरजी को अपनी गऊओं के साथ नंगे पाँव ही आना है। टेर-कदंब पै, कदंब के वृक्ष के पास दोनों भैया विराजें और गोस्वामीवृन्द समाज-गायन करें हैं। यहाँ लीलानुरुप ग्वाल-बाल, भोजन-प्रसाद की छीना-झपटी हू करें हैं। दोनों भैया मन्द-मन्द मुस्कराते रहें और संध्या समय श्रीनन्दलालजू अपनी मंडली सहित अपनी गईयन कूँ लैके नन्दभवन कूँ प्रस्थान करें। चहुँ-दिशि आनन्द ही आनन्द। स्वरुपों में मानो साक्षात दोनों भाई ही उतर आते हैं। वही चितवन, वही बांकपन, वही अठखेलियाँ। टेर कदंब अर्थात कदंब का वह वृक्ष, जिस पर चढ़कर संध्या समय, नन्दलाला अपनी गायों के नाम को लेकर पुकारते हैं क्योंकि सब गायों को इकट्ठा कर वन से वापस नन्दगाँव लौटना है [ब्रजभाषा में टेर का अर्थ होता है पुकारना,बुलाना]। 
जब दास टेर-कदंब पहुँचा तब नन्दलाल के आने में करीब एक घंटे का समय शेष था। समाचार मिला कि नन्दगाँव से निकल चुके हैं सो पग बढ़ा दिये उस कदंब वृक्ष की ओर, जहाँ पर त्रिभुवन-सुखदाता विराजेंगे। गोपाष्टमी के पर्व पर टेर-कदंब पर भी उत्सव की उमंग रहती है और अनेक श्रद्धालु और संत-भक्त अपने लाड़लों से मिलने की, देखने की, उन्हें भोग लगाने की कामना लिये वहाँ प्रतीक्षा करते हैं। कदंब के वृक्ष से अनुमानत: १५-२० फ़ीट की दूरी रही होगी। दृष्टी पड़ी, कदंब के तले एक महात्मा, वयस ६०-६२, श्वेत धोती और वक्ष पर एक श्वेत उत्तरीय डाले एक आसन पर बैठे हैं। कदंब के नीचे नन्दलाल का एक छवि-चित्र है।
अचानक ही महात्माजी की दृष्टि दास की दृष्टी से मिली और वह बोले - "बड़ी देर करी मेरी सुध लैवे में ! इतनैं बरसन के बाद आज मेरी सुध आयी ! मोकूँ काह एकदम ही भूलि गये ! दर्शन कूँ अँखियाँ तरस गयीं !" यह कहते-कहते वह प्रेमाश्रु बहाते हुए उठ खड़े हुए। दास अचकचा गया। समझ न सका कि वो किसे इंगित करते हुए कह रहे हैं। अपने पास और पीछे देखा, लोग तो थे पर यह संबोधन वह अन्य किसी को नहीं कर रहे थे। एक बार पुन: दृष्टी मिली, उन्होंने दोनों बाँहें फ़ैला दी प्रेमासिक्त उलाहना देते हुए। श्रीकिशोरीजी ने कृपा की और दास अपने स्वामी को पहिचान गया। उनके शब्दों को श्रवण कर, अपनी पतितता का भान कर मस्तक और दृष्टी धरती में गड़ी जा रही थी पर यह दुर्लभ समय था, इसे कैसे खो देता सो अपनी भी दोनों बाँहें फ़ैला दीं और लगभग दौड़ते हुए दोनों ने एक-दूसरे को भुज-पाश में बाँध लिया। दोनों ही बिलख-बिलखकर रो रहे हैं। उनके अश्रु दास के कंधे पर और दास के अश्रु उनके धवल उत्तरीय को भिगो रहे हैं। कुछ समय बाद दोनों अलग हुए। उन्होंने हाथ पकड़ लिया और कदंब के तले अपने ही पास आसन पर बैठा लिया। लोग सोच रहे हैं कि महात्मा के वेष में कोई बावरा है सो किसी का ध्यान यहाँ नहीं है। सबको ठाकुरजी की प्रतीक्षा है और ऐसे समय दो बावरों की यह लीला कुछ अटपटी सी भी लग रही है पर श्रीकिशोरीजी की कृपा के कारण दास को इतना विदित है कि वह ऐसे ही मिलता है। वह मिल भी लेता है और किसी को कानों-कान खबर भी नहीं होती। बहुधा तो उसे भी खबर नहीं होती, जिससे वह मिल जाता है। दास का तो ऐसा दृढ़ विश्वास है कि वह सबमें तो है हीं, सबके बीच में भी है और यदा-कदा अपने विशेष स्वरुप में सामने भी प्रत्यक्ष हो जाते हैं पर हम संसार में इतने खोये हुए हैं कि हमें उनकी अनुभूति तक नहीं होती। जिस प्रकार खेल में मग्न अपने बालक को माता बीच-बीच में आकर देखती रहती है, भले ही बालक उसे ऐसा करते न देख पावे। हम संसार में परमात्मा को खोजते हैं और जब परमात्मा कृपा कर मिलते हैं तो उनमें संसार खोज लेते हैं अर्थात उन्हें भी संसारी ही समझते हैं क्योंकि वह उस स्वरुप में नहीं आते जिसे हम उनका स्वरुप मान बैठे हैं। ब्रज में नित्य-मिलन है, नित्य-विरह है और नित्य नयी लीला है मेरे श्रीयुगलकिशोर की। कुछ समय तक दोनों पास बैठे रहे। वह दास के हाथों को अपने हाथ में लिये रहे। फ़िर उठे, बोले - "ठाकुरजी आने वाले हैं, अभी आता हूँ।" वहाँ उपस्थित लोगों के बीच से निकल कब-कहाँ गये; ये वो जानें या उनका दास। कैसा अदभुत प्रेम ! मिलन की कैसी उत्कंठा ! कैसे अदभुत छल से सबके बीच आके मिलना ! कैसा अदभुत उलाहना ! अकिंचन को कैसा मान देना ! कैसे वह पूरी बिसात ही पलट देते हैं और दास से ऐसा व्यवहार मानो वह स्वामी ? इतने जनसमूह में ऐसे शब्दों का प्रयोग करते समय किंचित भी संकोच नहीं ! ह्रदय से निकले शब्द !
कुछ समय बाद दोनों भाई आ गये। दर्शन किये, प्रसाद पाया। छककर पाया, क्या नहीं पाया ? क्या शेष रहा ? अयोग्य को वही दे सकते हैं। संबध निभाना एक वही जानते हैं। तू जैसा भी है, मेरा है; यह आश्वासन भी वही दे सकते हैं। दास को गर्व है अपनी स्वामिनी और स्वामी पर। वो मेरे हैं, मैं उनका हूँ।

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