Thursday, 8 May 2014

न जाने कितने जन्मों की प्रतीक्षा के बाद। आत्मा और परमात्मा का मिलन

भक्त कैसा ? भक्तिमती मीराबाई जैसा !
मेरो तो गिरधर-गोपाल, दूसरो न कोई ! एक ही लक्ष्य ! अदभुत दिव्य-दृष्टि ! अनुपमेय प्रेम !
जागतिक वंचनाओं को सहते हुए भी कैसी श्रद्धा, कैसा विश्वास ! जगत द्वारा दिये गये प्रत्येक शारीरिक-मानसिक कष्ट में भी सांवरे सलोने की कृपा का अनुभव ! मीरा बावरी ! बावरी ही तो ! प्रेमी बावरे ही तो होते हैं ! बिना बावरा हुए भी कहीं प्रेम संभव है ! बिना बावरा हुए वह नजर कहाँ से मिले कि सबमें वही एक प्राण-प्रियतम ही दिखे ! प्रेमी को कब पता चलता है कि वह बावरा हो गया, इतना अवकाश कहाँ कि स्वयं को देखे ! बस, जिधर देखूँ, तू ही तू ! लोक-लाज, नियमों का पालन तो वही कर सकता है जिसे देह-सुध हो, बुद्धि कार्य करती हो। जब सुधि नहीं, बुद्धि नही, इन्द्रियाँ अपना कार्य न कर स्वयं बावरी हो रही हों तो जागतिक नियम तो टूटेंगे ही। 
राणा ने अनुचर के द्वारा मीराबाई के लिये स्वर्णपात्र में कालकूट विष भेजा है। अनुचर कहता है कि यह श्रीश्यामसुन्दर का चरणोदक है। श्रीश्यामसुन्दर का चरणोदक ! मेरे गिरधर-गोपाल का चरणोदक ! मीराबाई ने अनुचर के हाथों से स्वर्णपात्र को ले लिया और माथे से लगा लिया। देखा कि स्वर्णपात्र में कालकूट है किन्तु अब वह कालकूट कहाँ ? अनुचर के द्वारा "श्रीश्यामसुन्दर का चरणोदक" सुनते ही भाव बदल गया और अब तो वह कालकूट भी मानो श्यामसुन्दर से अपनी अंतरंगता का स्वयं ही बखान कर रहा है कि उस काले नन्दलाल की दिव्य-देह को प्रक्षालित कर स्वयं ही उसके रंग में रंग गया हूँ और अनुचर मिथ्या नहीं कह रहा। स्वर्णपात्र में भरे उस कालकूट विष को देखकर मीरा को प्रतीत होता है मानो स्वर्णवर्णा श्रीराधा रानी के ह्रदय में कृष्णवर्ण श्रीश्यामसुन्दर विराज रहे हों। धन्य हुयी प्रभो ! ऐसी कृपा ! एक साँस में ही तो पी गयी मीरा उस "दिव्य चरणोदक" को ! मीराबाई के जीवन में बने रहे इस भाव का क्या परिणाम हुआ। जिस कालकूट विष को मीरा की इस नश्वर देह का नाश करना था, उस कालकूट चरणोदक ने मीरा की नश्वर देह का नाश कर उसकी देह को दिव्य कर दिया ! 
इस जगत ने अघटन को घटते देखा ! अपने सांवरे के ध्यान में बेसुध मीरा नृत्य कर रही है, देह की सुध-बुध नहीं है। भजन के प्रताप से दिव्य देह हो गयी है मीरा की। उनके मुख पर दृष्टी ठहर ही नहीं पाती। ऐसा तेज है कि दृष्टी स्वत: ही नीचे हो जाती है। ऐसी अनिंध्य सुंदरी, ऐसी सती, ऐसी भक्तिमती को कौन संभाले ? किसकी सामर्थ्य है ? केवल एक की ही ! और उसने संभाल ही तो लिया।
नृत्य करते-करते बेसुध मीरा मंदिर के गर्भ-गृह में प्रवेश कर गयी। मंदिर के प्रांगण में बैठे भक्त भी अपनी सुध-बुध खो बैठे हैं। मीराबाई के भजनों से ऐसा रस बरसा है कि आबल-वृद्ध सब सराबोर हैं। कीर्तन की ध्वनि अपने चरम पर है। यकायक विध्युत कौंध उठी, श्रद्धालुओं की आँखें चौंधिया गयी और कुछ अस्पष्ट सा दिखा कि श्रीविग्रह से निकलकर सांवरे ने दोनों हाथ बढ़ाकर अपने भक्त को सँभाल लिया और सदेह अपनी भक्त को अपने में एकाकार कर लिया। कुछ शेष रहा तो मीरा के आँचल का एक सिरा, वह भी अपने सांवरे से लिपटा हुआ !
जयघोष हो रहा है, भक्त और भगवान का। किन्तु दोनों को ही उसकी परवाह कहाँ ? दोनों की साध पूरी हुयी, न जाने कितने जन्मों की प्रतीक्षा के बाद। आत्मा और परमात्मा का मिलन ! दो होकर एक ! एक होकर दो ! 

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