श्रीराम।हे मेरे अज्ञ मन कैसी माया मे फँसे हो।दो माला नाम की जप ली अपने को बङा महात्मा समझने लगा।कुछ लोग कँठी तिलक और मुख से राम नाम निकलता देख तुम्हे राम भक्त जानकर आदर क्या करने लगे तूने तो अपने आप को पूजनीय ही मान लिया।यदि कोइ तुम्हे प्रणाम न करे तो उसे कुसँस्कारी और जो प्रणाम कर दे उसका कल्याण निश्चित हुआ बताते हो।दुनिया को दिखाते दिखाते खुद भी यह मानने लग गए कि भगवान तुम्हारे वश मे है और तुम्हारे कहे अनुसार चलेगे।अरे मूर्ख तू स्वयँ तो पतन की गर्त मे गिरे गा ही और बेचारे भोले भाले लोग जो तुमपर विश्वास कर बैठे है उन्हे भी ले डूबेगा।अरे कपटी अभी भी चेत जा ।जिन श्रीराम की दया से तेरी रसना पर नाम आया है उनसे ही रामनाम के प्रति प्रेम की भीख माँग।यह तिलक यह कंठी तभी तक सार्थक है जबतक रामनाम तुम्हारी रसना पर है।अरे बिन राम नाम के यह सब किसी काम के नही।रामनाम भगवान की दया से मिली बढाइ से अभिमान करने की जगह इससे बचने का प्रयत्न कर।अरे मूर्ख रामजी दीनो को प्रेम करने वाले है अतः अपनी दीनता के भाव से कभी विमुख नहो।विनम्र रहते हुए सन्तो के चरणो की सेवा कर न कि लोगो को अपने चरण छूने को बोल।राम जी के लिए रामजी का होकर रामजी के प्रेम मे रामजी के ही नाम का जाप सुमिरण कर और यह जपसुमिरण होता रहे इसके लिए रामजी की ही कृपा की भीख माँग।रामजी को छोङ और कोई मार्ग तेरे कल्याण हेतु नही है।
चल भाव से बोल श्रीराम श्रीराम
चल भाव से बोल श्रीराम श्रीराम
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