! कैसा अदभुत प्रेम ! कैसा वात्सल्य ! कैसे रस भरे वचन !
कल श्रीगिरिराज गोवर्धन में तलहटी में एक वात्सल्य-भाव पूरित अनुरागी संत के सानिध्य में था। श्रीगिरिराज तलहटी में दोपहर गुनगुनी धूप में ब्रज-रज में बैठे हुए थे। संतश्री के पास ही लगभग एक फ़ुट के श्रीलड्डूगोपाल पीठ फ़ेरे मीठे पुओं का भोग लगा रहे थे। दर्शन कर ह्रदय प्रफ़ुल्लित हो उठा। संतश्री ने प्रेम से अपने पास ही बैठा लिया। श्रीगिरिराज तलहटी में लड्डूगोपाल [बालगोपाल] भोग लगा रहे हैं। स्मरण हो आया कि यहीं उन्होंने गोवर्धन-लीला की थी तब भी संभवत: ऐसे ही भोग लगाया होगा। उनकी कृपा और अपने सौभाग्य पर ह्रदय आनन्दित हो उठा। कहा - "तो पीठ फ़ेर के भोग लग रह्यो है।"
संतश्री आनन्दित हो उठे, मुस्कराकर बोले - "हाँ, पूआ पाय रहयो है। खाय-पीके काम में हू तो लगनो है। यहाँ से बंदर-कुत्ताहू तो भगावेगो।" थोड़ी देर बाद भोग का समय पूरा हो जाने पर संतश्री ने बालगोपाल को सीधे हमारी ओर मुख करके बैठा दिया। संतश्री ने मीठे पुओं का प्रसाद दिया। प्रेम से आनन्द-विभोर हो पाया। दृष्टि पड़ी तो देखा कि बालगोपाल के कंठ में तुलसी की कंठी बँध रही है। संतश्री की दृष्टी, दास की दृष्टी से मिली और उन्होंने बड़े ही प्रेम से, बड़ी ही रसभरी वाणी में कहा - " सब कहमें कि "कृष्णं वन्दे जगदगुरु। इतै हमने जाकूँ कंठी पहिरायकै अपनौ चेला बनाय लीनो है।"
पुन: देखा कि गुरु-चेला दोनों ही मुस्करा रहे हैं। दोनों ही पक्के। दोनों ही एक-दूसरे पर न्योछावर। दोनों की ही दिव्य-देह से टपकता हुआ रस मानो सम्पूर्ण श्रीगिरिराज तलहटी की रज को प्रेम से, आनन्द से भर रहा हो। जैसा भक्त का भाव, वैसे ही ठाकुर ! जय हो ! जय हो ! श्रीगिरि-गोवर्धन की जय हो ! ब्रज-रज की जय हो ! अनुरागी-रसिकों की जय हो ! सच्चे संतों की जय हो ! सच्चे भक्तों की जय हो ! भक्तों के भावानुरुप स्वयं को परिवर्तित करने वाले मेरे ठाकुर की जय हो ! मेरी ठकुरानी की जय हो ! जय हो वृन्दावनेश्वरी की ! जय हो मेरी किशोरी की ! ब्रज में निवास कर रहे समस्त जड़-चेतन की जय हो !
कल श्रीगिरिराज गोवर्धन में तलहटी में एक वात्सल्य-भाव पूरित अनुरागी संत के सानिध्य में था। श्रीगिरिराज तलहटी में दोपहर गुनगुनी धूप में ब्रज-रज में बैठे हुए थे। संतश्री के पास ही लगभग एक फ़ुट के श्रीलड्डूगोपाल पीठ फ़ेरे मीठे पुओं का भोग लगा रहे थे। दर्शन कर ह्रदय प्रफ़ुल्लित हो उठा। संतश्री ने प्रेम से अपने पास ही बैठा लिया। श्रीगिरिराज तलहटी में लड्डूगोपाल [बालगोपाल] भोग लगा रहे हैं। स्मरण हो आया कि यहीं उन्होंने गोवर्धन-लीला की थी तब भी संभवत: ऐसे ही भोग लगाया होगा। उनकी कृपा और अपने सौभाग्य पर ह्रदय आनन्दित हो उठा। कहा - "तो पीठ फ़ेर के भोग लग रह्यो है।"
संतश्री आनन्दित हो उठे, मुस्कराकर बोले - "हाँ, पूआ पाय रहयो है। खाय-पीके काम में हू तो लगनो है। यहाँ से बंदर-कुत्ताहू तो भगावेगो।" थोड़ी देर बाद भोग का समय पूरा हो जाने पर संतश्री ने बालगोपाल को सीधे हमारी ओर मुख करके बैठा दिया। संतश्री ने मीठे पुओं का प्रसाद दिया। प्रेम से आनन्द-विभोर हो पाया। दृष्टि पड़ी तो देखा कि बालगोपाल के कंठ में तुलसी की कंठी बँध रही है। संतश्री की दृष्टी, दास की दृष्टी से मिली और उन्होंने बड़े ही प्रेम से, बड़ी ही रसभरी वाणी में कहा - " सब कहमें कि "कृष्णं वन्दे जगदगुरु। इतै हमने जाकूँ कंठी पहिरायकै अपनौ चेला बनाय लीनो है।"
पुन: देखा कि गुरु-चेला दोनों ही मुस्करा रहे हैं। दोनों ही पक्के। दोनों ही एक-दूसरे पर न्योछावर। दोनों की ही दिव्य-देह से टपकता हुआ रस मानो सम्पूर्ण श्रीगिरिराज तलहटी की रज को प्रेम से, आनन्द से भर रहा हो। जैसा भक्त का भाव, वैसे ही ठाकुर ! जय हो ! जय हो ! श्रीगिरि-गोवर्धन की जय हो ! ब्रज-रज की जय हो ! अनुरागी-रसिकों की जय हो ! सच्चे संतों की जय हो ! सच्चे भक्तों की जय हो ! भक्तों के भावानुरुप स्वयं को परिवर्तित करने वाले मेरे ठाकुर की जय हो ! मेरी ठकुरानी की जय हो ! जय हो वृन्दावनेश्वरी की ! जय हो मेरी किशोरी की ! ब्रज में निवास कर रहे समस्त जड़-चेतन की जय हो !
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