Sunday, 4 May 2014

पूर्ण संत भिक्षा व चंदा मांगता नहीं फिरेगा

     पूर्ण संत भिक्षा व चंदा मांगता नहीं फिरेगा। 
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कबीर, गुरू बिन माला फेरते गुरू बिन देते दान।
गुरू बिन दोनों निष्फल है पूछो वेद पुराण।।

3 ) तीसरी पहचान तीन प्रकार के मंत्रों (नाम) को तीन बार में उपदेश करेगा जिसका वर्णन कबीर सागर ग्रंथ पेज नं. 265 बोध सागर में मिलता है व गीता जी के अध्याय नं. 17 श्लोक 23 व सामवेद संख्या नं. 822 में मिलता है।
कबीर सागर में अमर मूल बोध सागर पेज 265-

तब कबीर अस कहेवे लीन्हा, ज्ञानभेद सकल कह दीन्हा ।
धर्मदास मैं कहो बिचारी, जिहिते निबहै सब संसारी ।।
प्रथमहि शिष्य होय जो आई, ता कहैं पान देहु तुम भाई ।।1।।
जब देखहु तुम दढ़ता ज्ञाना, ता कहैं कहु शब्द प्रवाना ।।2।।
शब्द मांहि जब निश्चय आवै, ता कहैं ज्ञान अगाध सुनावै ।।3।।

दोबारा फिर समझाया है -
बालक सम जाकर है ज्ञाना। तासों कहहू वचन प्रवाना ।।1।।
जा को सूक्ष्म ज्ञान है भाई। ता को स्मरन देहु लखाई ।।2।।
ज्ञान गम्य जा को पुनि होई। सार शब्द जा को कह सोई ।।3।।
जा को होए दिव्य ज्ञान परवेशा, ताको कहे तत्व ज्ञान उपदेशा ।।4।।

उपरोक्त वाणी से स्पष्ट है कि कडि़हार गुरु (पूर्ण संत) तीन स्थिति में सार नाम तक प्रदान करता है तथा चैथी स्थिति में सार शब्द प्रदान करना होता है। क्योंकि कबीर सागर में तो प्रमाण बाद में देखा था परंतु उपदेश विधि पहले ही पूज्य दादा गुरुदेव तथा परमेश्वर कबीर साहेब जी ने हमारे पूज्य गुरुदेव को प्रदान कर दी थी जो हमारे को शुरु से ही तीन बार में नामदान की दीक्षा करते आ रहे हैं। हमारे गुरुदेव रामपाल जी महाराज प्रथम बार में श्री गणेश जी, श्री ब्रह्मा सावित्री जी, श्री लक्ष्मी विष्णु जी, श्री शंकर पार्वती जी व माता शेरांवाली का नाम जाप देते हैं। जिनका वास हमारे मानव शरीर में बने चक्रों में होता है। मूलाधार चक्र में श्री गणेश जी का वास, स्वाद चक्र में ब्रह्मा सावित्री जी का वास, नाभि चक्र में लक्ष्मी विष्णु जी का वास, हृदय चक्र में शंकर पार्वती जी का वास, कंठ चक्र में शेरांवाली माता का वास है और इन सब देवी-देवताओं के आदि अनादि नाम मंत्र होते हैं जिनका वर्तमान में गुरुओं को ज्ञान नहीं है। इन मंत्रों के जाप से ये पांचों चक्र खुल जाते हैं। इन चक्रों के खुलने के बाद मानव भक्ति करने के लायक बनता है। 

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