एक दिन एक बीज ने अपने पिता से कहा कि में भी आपकी तरह बहुत बड़ा व्रक्ष बनना चाहता हूँ, में आपके जैसा व्रक्ष कब बनूँगा? व्रक्ष कुछ समय तो मोन रहा फिर गंभीर आवाज में बोला---इसके लिए तुम्हे मिटना होगा ....अपने अस्तित्व का समाप्त करना होगा। तो बीज ने पूछा --क्या इसमें पीड़ा होती है? व्रक्ष ने ईमानदारी से जवाब दिया -----बिना पीड़ा के तो इस संसार में कोई नव निर्माण संभव ही नहीं है। बीज कुछ उदास हो गया ...तो व्रक्ष पुनः बोला- यदि पीड़ा से तुम्हारी माँ भी घबराती तो तुम दुनिया में कैसे आते ...संसार में हर सुख के साथ दुःख भी होते है, तुम्हे दुखो से कभी नहीं घबराना चाहिए।
और इस प्रकार बीज ने एक दिन निर्णय कर ही लिया कि मिट तो में वैसे भी जाऊंगा ही तो क्यों ना मिटटी में मिलकर अपने अस्तित्व को मिटा दूँ ..और बीज एक दिन मिटटी में मिल जाता है ...जमीन की गहराइयो में अपने आप को दफ़न कर देता है। मिटटी में परम शांति है ...संसार के सब शोरगुल समाप्त हो जाते है ....एक गहरा सन्नाटा है और सबसे बड़ी बात वहां बीज के करने के लिए कुछ भी नहीं है…. जो कुछ भी करती है वो कुदरत करती है , प्रकर्ति करती है।
यहाँ बीज के साथ दो प्रकार की घटना घटती है एक तो बीज सम्पूर्ण समर्पण कर देता है और प्रकर्ति उसमे शक्ति का विस्फोट करके उसे जमीन से बाहर निकाल कर धीरे-धीरे व्रक्ष बना देती है।दूसरा चिंतन ये है ...कि बीज उस सन्नाटे में अपने आप को अकेला पाकर घबरा जाता है और वो जमीन से बाहर निकलने के लिए अपनी शक्ति का संचय करता है और अपनी शक्ति को इतना बड़ा लेता है कि उसमे विस्फोट हो जाता है और बीज टूट जाता है और एक सुन्दर पोधा बनकर जमीन से बाहर आ जाता है।
और प्रकर्ति धीरे-धीरे उसे व्रक्ष बना देती है ...जो हजारो लोगो को अपनी छाया देता है ....फल फुल देता है और जाते-जाते अपनी लकडिया भी समाज कल्याण के लिए दे देता है ....यही तो बीज की अमर कथा है और सच कहूँ तो यही शिष्य की अमर कथा है और साधक की अमर कथा है। तुम जीवन में आगे तभी बढोगे जब अपनी जगह को छोड़ने के तैयार हो जाओगे ....गति करोगे तो स्थान भी बदलेगा और वातावरण भी बदलेगा ...और अंततः तुम जो हो वो तुम नहीं रहोगे ....क्योकि ये तो बीज की यात्रा है
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