मैं और आप जीवन यात्रा के अकेले पथिक ...... संसार परिवर्तनशील है। इसमें कोई किसी का नहीं है। आप स्वयं में अकेले थे, हैं और रहेंगे। जगत में संबंध बनते, बिगड़ते रहते हैं। उम्र के अलग -अलग पड़ावों में कितने लोगों से मिले। संयोग बना और संबंध बने... कालांतर में ये संबंध धीरे-धीरे आगे बढे कुछ साथ रहे, कुछ विदा हो गए। फिर नए संबंध बने लगते हैं और पुराने टूटते जाते हैं। जब संयोग बना, तब भी आप थे और जब वियोग हुआ, तब भी आप ही थे। उसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ। आप वहीं के वहीं रहे। आपका अस्तित्व किसी के साथ संबंध बनने व समाप्त हो जाने के अधीन नहीं है। संयोग बनना व वियोग होना तो सांसारिक प्रपंच मात्र है। हां, संसार में जीवित रहने पर लोगों से संबंध बनते अवश्य हैं, परंतु यह संदेहरहित है कि सत्य स्वरूप आप अकेले थे और अकेले ही रहेंगे।
इस सत्यता का प्रकटीकरण तभी हो पाता है, जब कोई सबसे निकटतम प्रियजन इस संसार से विदा हो जाता है। तब मनुष्य के मस्तिष्क को जोरदार झटका लगता है। सच्चाई प्रकट हो जाती है कि इस जगत में कोई किसी का नहीं है। सभी मार्ग में सफर करते हुए यात्री मात्र हैं। जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ती जाती है, नए-नए यात्री मिलते जाते हैं। ढका हुआ सत्य पूर्ण रूप से प्रकट होकर सामने आ जाता है। वह ठहर कर सोचने लगता है कि अरे मैंने तो सोचा था कि संसार से विदा हो जाने वाले से हमारा कभी संबंध विच्छेद होगा ही नहीं, यह केवल मेरा मिथ्या भ्रम ही था। लोग बदलते हैं, समाज बदलता है, दुनिया बदलती है, मनुष्य का समय व आयु भी परिवर्तित हो जाती है, परंतु आपका चेतन स्वरूप वही रहता है। आप पूर्ण सत्यस्वरूप चेतन तत्व परमपिता परमात्मा के अंश हैं, जिसका कभी परिवर्तन नहीं होता।
इस सत्यता का प्रकटीकरण तभी हो पाता है, जब कोई सबसे निकटतम प्रियजन इस संसार से विदा हो जाता है। तब मनुष्य के मस्तिष्क को जोरदार झटका लगता है। सच्चाई प्रकट हो जाती है कि इस जगत में कोई किसी का नहीं है। सभी मार्ग में सफर करते हुए यात्री मात्र हैं। जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ती जाती है, नए-नए यात्री मिलते जाते हैं। ढका हुआ सत्य पूर्ण रूप से प्रकट होकर सामने आ जाता है। वह ठहर कर सोचने लगता है कि अरे मैंने तो सोचा था कि संसार से विदा हो जाने वाले से हमारा कभी संबंध विच्छेद होगा ही नहीं, यह केवल मेरा मिथ्या भ्रम ही था। लोग बदलते हैं, समाज बदलता है, दुनिया बदलती है, मनुष्य का समय व आयु भी परिवर्तित हो जाती है, परंतु आपका चेतन स्वरूप वही रहता है। आप पूर्ण सत्यस्वरूप चेतन तत्व परमपिता परमात्मा के अंश हैं, जिसका कभी परिवर्तन नहीं होता।
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