हरि के चरण पकर मन मेरा, यहु अविनाशी घर तेरा ॥ टेक ॥
जब चरण कमल रज पावै, तब काल व्याल बौरावै ।
तब त्रिविध ताप तन नाशै, तब सुख की राशि विलासै ॥ १ ॥
जब चरण कमल चित लागै, तब माथै मीच न जागै ।
तब जनम जरा सब क्षीना, तब पद पावन उर लीना ॥ २ ॥
जब चरण कमल रस पीवै, तब माया न व्यापै जीवै ।
तब भरम करम भय भाजै, तब तीनों लोक विराजै ॥ ३ ॥
जब चरण कमल रुचि तेरी, तब चार पदारथ चेरी ।
तब दादू और न बांछै, जब मन लागै सांचै ॥ ४ ॥
जब चरण कमल रज पावै, तब काल व्याल बौरावै ।
तब त्रिविध ताप तन नाशै, तब सुख की राशि विलासै ॥ १ ॥
जब चरण कमल चित लागै, तब माथै मीच न जागै ।
तब जनम जरा सब क्षीना, तब पद पावन उर लीना ॥ २ ॥
जब चरण कमल रस पीवै, तब माया न व्यापै जीवै ।
तब भरम करम भय भाजै, तब तीनों लोक विराजै ॥ ३ ॥
जब चरण कमल रुचि तेरी, तब चार पदारथ चेरी ।
तब दादू और न बांछै, जब मन लागै सांचै ॥ ४ ॥
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