Tuesday, 22 April 2014

अनंतता का सतत अनुभव कर सके

भगवान नीलवर्ण क्यों हैं ?नील वर्ण अरु नील सरोरुह पीत वसन संग शोभित कान्हा।
प्रभु स्वरुप विशाल है, उनकी महिमा अपार है। हम किसी भौतिक वस्तु से इसकी तुलना नहीं कर सकते। नमक की पुतली यदि सागर की गहराई नापने जाएगी तो क्या वह स्वयं गल नहीं जाएगी? वेसे नीलवर्ण विशालता, व्यापकता और अनंतता का प्रतीक है। अगाध आकाश का रंग नीला है।वैसे ही अनंत महासागर का रंग भी नीला है। प्रभु दर्शन करने वाले भागवद भक्त प्रभु की विशालता व्यापकता और अनंतता का सतत अनुभव कर सके, इसलिए भगवन के चित्रों और प्रतिमाओ में भगवन को नीलवर्ण का रखा गया है।
श्री कृष्ण भगवान ने गीता में स्वयं कहा है," हे अर्जुन ! तू मेरा शरणागत हो जा मैं तुझे हर पाप से मुक्ति दूंगा शोक न कर मेरी भक्ति में खो जा'' 
संतों का मत है कि जब कोई भक्त भगवान के शरणागत हो स्वयं को उन्हें समर्पित कर देता है तो भगवान उनके सभी पापों, कष्टों को स्वयं ग्रहण कर लेते हैं। पाप का रुप काला है और भक्तों के पापों का हरण करने पर भगवान काले हो गए। भगवान का यह रंग उनके व्यक्तित्व को दर्शाते हैं। दरअसल इसके पीछे भाव है कि भगवान का व्यक्तित्व अनंत है। उसकी कोई सीमा नहीं है, वे अनंत है। ये अनंतता का भाव हमें आकाश से मिलता है। आकाश की कोई सीमा नहीं है। वह अंतहीन है। 

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