Sunday, 20 April 2014

बंधन को तोड़कर ईश्वर से एकात्म होते हैं।

कृष्ण नाम दीवानी जन्नाबाई की नस नस में कृष्ण नाम बस गया था। वह कृष्ण नाम रस का पान करते उपले थापा करती थी उन उपलों से भी कृष्ण नाम का उच्चारण होता था। 

संत कबीर जन्नाबाई भक्ता से मिलने गए। यह क्या जन्नाबाई और एक अन्य महिला में उपलों को लेकर झगड़ा हो रहा था। जन्ना कह रही थी उपलें मेरे हैं और वह महिला कह रही थी तू झूठ बोल रही है उपलें मेरे हैं।
संतकबीर ने जन्ना बाई से कहा, "जन्ना! यदि उपले उसके हैं तो उसे दे दो।"

लेकिन जन्ना बाई ने प्रेम आश्रु आंखों में भरकर कहा," हरे कृष्णा! हरे कृष्णा! कबीर जी ये उपलेे तो मेरे ही हैं यदि आपको मेरे पर विश्वास न हो तो कान लगाकर सुनो।"
लेकिन जन्ना बाई ने प्रेम आश्रु आंखों में भरकर कहा," हरे कृष्णा! हरे कृष्णा! कबीर जी ये उपलेे तो मेरे ही हैं यदि आपको मेरे पर विश्वास न हो तो कान लगाकर सुनो।"

संत कबीर ने जन्ना बाई की बात मान उपलों को एक एक करके उठाया और कान लगाकर सुनने लगे सचमुच उन उपलों में से हरे कृष्णा! हरे कृष्णा! की मधुर नाम ध्वनी निकल रही थी। जिससे यह प्रमाणित हो गया उपले जन्ना बाई के ही हैं।

जिस ने इस रस का पान किया वह इसमें ही डूब कर रह गया। हरिनाम रस की मस्ती निशदिन उतरती ही नहीं है। कलियुग में हरिनाम का जाप अमृत के समान है। इसका रसपान करने वाले प्राणी भवसागर के बंधन को तोड़कर ईश्वर से एकात्म होते हैं।

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