Thursday, 17 April 2014

महायोगी

गोरक्षनाथ (बाल रूप)
महायोगी गोरक्षनाथ को षिव का अवतार मानते हैं और षिवस्वरूप मानने के कारण ही षिवगोरक्ष की संज्ञा से उच्चारित करते हैं। यधपि आदिनाथ सृष्टी के प्रथम देव हैं किन्तु गोरक्षनाथ ने योगाभ्यास द्वारा स्वयं को उससे एकात्म कर लिया और इस प्रकार गोरक्षनाथ व आदिनाथ भिन्न नहीं है। गोरक्षनाथ नवनाथों में सर्वोपरि है और पवित्रता में आदिनाथ से अभिन्न होते हुए सृष्टी संचालन के लिये विभिन्न काल एवं भूखण्डों में प्रकट होते हैं। महायोगी गोरक्षनाथ का विषद वर्णन (हमारे ज्ञान की सीमा के अनुसार) तो पृथक से अगले अध्याय में करने का प्रयास किया है। प्रस्तुत प्रसंग में नवनाथों के स्वरूप को समझने के प्रयत्न में उनके बालरूप से मिलने वाला संकेत हमारा लक्ष्य है। गोरक्षनाथ को एक बालक की भांति निष्कपट, निष्पाप और निर्मल होने से पार्वती का ऐसा पुत्र भी कहा जाता है जो सृष्टी के नियमों से परे अद्वैत है और सभी देव, दानव, नर, किन्नर, यक्ष, गन्धर्व, नाग, वानर, जलन्द, परन्द, चर, अचर, उभयचर आदि जीवों के नैसर्गिक गुण मैथुन से नितान्त नि:षेष होने के कारण जती (यती अर्थात जगत प्रपंच से अनासक्त) है। यती एक बालक की वो अवस्था है जहां उसे अपनी नग्नता का कोर्इ आभास भी नहीं है। महायोगी गोरक्षनाथ अयोनिज (जिसकी उत्पति मैथुन जनित परिणाम न हो) है किन्तु सूर्य और चन्द्रमा की युति का माध्यम होकर भी वह उससे अप्रभावित ही रहता है। षिव ही कि तरह महायोगी गोरक्षनाथ के भी तीन नेत्र हैं। बायां नेत्र चन्द्रमा, दाहीना नेत्र सूर्य और भ्रूमध्य में ज्ञानचक्षु है जिसे षिव नेत्र भी कहा जाता है। प्रथम देव आदिनाथ के सदृष्य होने से महायोगी गोरक्षनाथ को स्वयं ज्योतिस्वरूप (जो स्वयं की ज्योती से प्रकाषित है) भी कहा जाता है। षिव से एकात्म हो चुका योगी जब स्वयं में, सर्वत्र और समस्त तत्वों में षिव का ही प्रतिबिम्ब देखता है तो अद्वैत हो चुके योगी के लिये कुछ भी धृणित और भयकारक नहीं रह जाता क्योंकि उसे सब में स्वयं का ही आभास होने लगता है। श्रीमदभगदगीता में श्रीकृष्ण ने छठे अध्याय के 30वें श्लोक में यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति, तस्याहं न प्रणष्यामि स च मे न प्रणष्यति।। कह कर इस अद्वैत दर्षन को समझाया है तो नाथयोगियों द्वारा घट-घट वासी, गोरक्ष अविनाषी, टले काल मिटे चौरासी।। कह कर गोरक्ष (षिव) के सर्वत्र व सभी में व्याप्त होने की अवधारणा की जाती है।

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