बीज तप कर वृक्ष बनता है, नर तप कर नारायण बनता है। पुरुष से पुरुषोत्तम और आत्मा से परमात्मा बनने का यही मार्ग है। तप मनुष्य के दोषों के निवारण के लिए एक रसायन है। साधना स्वयं को सुघड़ बनाने का प्रयास है। साधना वही है जो साध्य को दिशा दे। तप साधना से निखरा व्यक्ति अनिवार्य निर्वाह के अतिरिक्त अपनी समस्त सम्पत्तियां और विभूतियां लोक कल्याण के लिए समर्पित कर देता है। यही प्रभु समर्पित जीवन है। ऐसा जीवन जीने वाला ही तपस्वी तथा देवोपम सिद्ध पुरुष कहलाने का अधिकारी है।
गृहस्थ जीवन में अनेक कष्ट हैं, छटपटाहट है। आज का गृहस्थ राग-द्वेष और विषय कषाय में लिप्त रह कर सिर्फ शाब्दिक उपासना कर रहा है। तप द्वारा उस कष्ट का निवारण संभव है। संसार की वेदना को मिटाने के लिए तप रूपी औषधी का प्रयोग करना होगा। परमात्मा इस शरीर के भीतर ही शुभ्र ज्योति के रूप में विद्यमान है। वह सत्य,तप, ब्रह्मचर्य और विवेक द्वारा ही प्राप्त होता है। जिन्होंने अपने दोषों को दूर कर लिया है वे प्रयत्नशील साधक ही उसका दर्शन करते हैं।
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