Tuesday, 10 June 2014

आत्मा को चेतना मिलती है

गुरु की महत्ता ।
गुरु आत्मा और परमात्मा के मध्य के सूत्रधार हैं । प्रेम, सहजता ,मुक्ति , शक्ति ,भक्ति और रक्षा की पराकाष्ठा हैं । आत्मा को चैतन्य करने के कार्यपालक हैं । 
अगर एक नवजात शिशु को जंगल में छोड़ दो उसकी मृत्यु निश्चित है । अगर परमात्मा की कृपा से बच गया तो वो पशुओं की तरह व्यवहार करेगा । पशुओ की तरह विचरण करेगा । 
जब शिशु को अपने माता पिता के कार्यों का अनुभव हो और उनका अनुकरण करे तो वो मनुष्य बनता है ।
गुरु की प्रक्रिया अध्यात्म में ऐसी ही है । अगर मनुष्य को गुरु संगती ना मिले तो मनुष्य होते हुए भी पशुओं की भाँती विचरण करते हुए मृत्यु को प्राप्त होता है । 
मनुष्य इस पवित्र योनि में भी रह कर इस देह का दुरूपयोग हर संभव तरीके से करता है । अगर उसे गुरु शरण और संगती प्राप्त हो जाये आत्मा को चेतना मिलती है और परमात्मा की अनुभूति कर उसमे तल्लीन हो जाता है ।
इसीलिए गुरु दीक्षा और संस्कार एक मनुष्य का नवजीवन होता है । संस्कार के बाद मनुष्य शरीर रूपी बन्धनों के माध्यम से ना दिखने वाले तत्वों का अनुभव कर सकता है । पर गुरु द्वारा दी गयी साधनाओ के लिए आवश्यक है 
पात्रता की 
आत्मानुभूति की
सहजता की
प्रेमऔर भक्ति की
और समर्पण की ।

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