गुरु प्रेम हैं , करुणा का स्वरुप हैं , ममता की छांव हैं, ज्ञान के सागर हैं रक्षक हैं , अप्रत्यक्ष होकर भी प्रत्यक्ष हैं ।
गुरु अपने ज्ञान से उपदेश से शिष्य के पात्र को साफ़ कर ज्ञान को रुकने लायक बना देते हैं । पर ज्ञान एकत्र करने के लिए शिष्य को अपने पात्र को खुद चमकाना होता है । गुरु शिष्य की अर्जित की हुई शक्तियां बिखरने से बचाते हैं । उसका उत्तम मार्गदर्शन कर जन निहित कल्याण को अग्रसर करते हैं ।
स्वार्थ मद मोह माया लोभ इर्ष्या से दूर करते हैं ।
योग्य गुरु की प्राप्ति कैसे हो ?
संत संगती उत्तम और सरल उपाय है गुरु प्राप्ति का । संतो से मिलें ज्ञान अर्जित करें । सभी से मिलें पर गुरु दीक्षा की आशा ना रखें ।ना ही साधना और मंत्र की अभिलाषा रखें । संत रुपी गुरु तत्त्व से ज्ञान बटोरें । महाकाल की आज्ञा से जब गुरु स्वरूपी ब्रम्ह आपके सामने होंगे तब आत्मा पुकार उठेगी येही हैं गुरु , बस रम जाओ इनके सान्निध्य को पा लो । तब गुरु को परखें और जब महामाया का आदेश होगा गुरु दीक्षा हो जाएगी ।
इस संसार में सब कुछ तीव्र गति से पाने की आपाधापी में आडम्बर धारी महापुरुषों को गुरु समझ कर दीक्षा ना लें । और अगर दीक्षा ले भी लें और अश्रद्धा हो जाने पर गुरु को बुरा ना बताएं । इस कार्य से गुरु धम का पाप लगता है । क्यूंकि शिष्य का प्रथम वचन गुरु की वाणी का अनुसरण करना होता है कर्म का नहीं । अतः जो गुरु कहें वो करें जो करें वो ना करें ।
गुरुदेव एवं गुरु तत्त्व से जो मिले वो ग्रहण करें। गुरु तत्त्व हर जगह एवं हर वस्तु में है । सभी क्रिया कलापों में इश्वर का सन्देश होता है । सन्देश ग्रहण करें और परम गुरु महा महाकाल में रम जाएँ । वो सब सुलभ कर देते हैं ।
गुरु अपने ज्ञान से उपदेश से शिष्य के पात्र को साफ़ कर ज्ञान को रुकने लायक बना देते हैं । पर ज्ञान एकत्र करने के लिए शिष्य को अपने पात्र को खुद चमकाना होता है । गुरु शिष्य की अर्जित की हुई शक्तियां बिखरने से बचाते हैं । उसका उत्तम मार्गदर्शन कर जन निहित कल्याण को अग्रसर करते हैं ।
स्वार्थ मद मोह माया लोभ इर्ष्या से दूर करते हैं ।
योग्य गुरु की प्राप्ति कैसे हो ?
संत संगती उत्तम और सरल उपाय है गुरु प्राप्ति का । संतो से मिलें ज्ञान अर्जित करें । सभी से मिलें पर गुरु दीक्षा की आशा ना रखें ।ना ही साधना और मंत्र की अभिलाषा रखें । संत रुपी गुरु तत्त्व से ज्ञान बटोरें । महाकाल की आज्ञा से जब गुरु स्वरूपी ब्रम्ह आपके सामने होंगे तब आत्मा पुकार उठेगी येही हैं गुरु , बस रम जाओ इनके सान्निध्य को पा लो । तब गुरु को परखें और जब महामाया का आदेश होगा गुरु दीक्षा हो जाएगी ।
इस संसार में सब कुछ तीव्र गति से पाने की आपाधापी में आडम्बर धारी महापुरुषों को गुरु समझ कर दीक्षा ना लें । और अगर दीक्षा ले भी लें और अश्रद्धा हो जाने पर गुरु को बुरा ना बताएं । इस कार्य से गुरु धम का पाप लगता है । क्यूंकि शिष्य का प्रथम वचन गुरु की वाणी का अनुसरण करना होता है कर्म का नहीं । अतः जो गुरु कहें वो करें जो करें वो ना करें ।
गुरुदेव एवं गुरु तत्त्व से जो मिले वो ग्रहण करें। गुरु तत्त्व हर जगह एवं हर वस्तु में है । सभी क्रिया कलापों में इश्वर का सन्देश होता है । सन्देश ग्रहण करें और परम गुरु महा महाकाल में रम जाएँ । वो सब सुलभ कर देते हैं ।
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