Tuesday, 10 June 2014

अन्यथा सब बेकार है

साधक उस कमल की तरह होता है जो दलदल के ऊपर खिलता है । यह संसार एक दलदल है इसमें जितना फसोगे उतना और फसते जाओगे । संसार के दलदल रुपी चक्रव्यूह को नहीं तोडा गया तो संसार ने बड़े बड़े साधकों को अपने में लील लिया है । ऐसे कई सांसारिक व्यक्ति हैं जो संन्यास लेना चाहते हैं । पर संन्यास लेना खेल नहीं है । संन्यास की उत्कृष्ट मर्यादाएं होती हैं । उनको निभाना उतना ही कठिन होता है । एक सांसारिक विचारात्मक रूप में महामाया के गर्भ में रहता है । दीक्षा संस्कार के बाद उसका नया जन्म होता है । गर्भ से बाहर निकल कर वास्तविक दुनिया का दर्शन करता है । पर भटके हुए सन्यासी शुतुरमुर्ग की तरह मुंह छिपाए हुए सांसारिक लोलुपता में डुबे हुए रहते हैं । 
एक साधक के साधना में काफी अड़चन आते हैं जिनमे चमत्कारिक शक्तियों के प्रदर्शन से भीड़ इकठ्ठा होना । स्त्री लोलुपता । धन सम्बन्धी लोलुपता । शिष्य एवं प्रसिद्धि लोलुपता साधक को संसार रूपी दलदल में खींच लेती है । 
एक साधक के लिए परम परमात्मा से मिलन और सांसारिक उपलब्धियों का त्याग ही सब कुछ है । इक सांसारिक किसी भी साधक की प्रार्थना तभी तक करता है जब तक उसका कार्य निर्विघ्न रूप से होता है । ऐसे स्वार्थ निहित प्रसद्धियों से महाकाल को कोई मतलब नहीं होता । अतः सांसारिक प्रसिद्धियाँ संसार में ही रह जाती हैं । महाकाली के चरणों में शरण पाने के लिए संसारिक प्रतिष्ठा और शिष्यों की संख्या काम नहीं आती है । 
अतः सांसारिक उपलब्धियों एवं प्रतिष्ठाओं से दूर रह कर साधना करें तो परमहंस तत्त्व की प्राप्ति ही सब कुछ है । अन्यथा सब बेकार है । 

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