Tuesday, 10 June 2014

साधना पथ को ही त्याग देते हैं

एक मनुष्य में आत्मीय सुगंध और दुर्गन्ध सर्वथा विराजमान रहते हैं । जब एक मनुष्य अपने कर्म ,विचार , वाणी और क्रिया कलापों में शुद्धता रखता है उसके शरीर से आत्मीय सुगंध निकलता रहता है । जो साधकों , संतों तथा प्रभु भैरव को आकर्षित करता है । ऐसे स्वच्छ विचारों वाले या आत्मीय सुगंध वाले व्यक्ति को अनुभूति या दर्शन अति सुलभ होते हैं । एक गुरु ऐसे ही पात्रता वाले शिष्यों पर मुग्ध हो जाते हैं ।
पर इसके विपरीत एक साधक जो वासना में लिप्त हो , क्रोध, काम, मोह, स्व प्रतिष्ठा तथा अपने को ज्ञानी साबित करने में तुला रहे तो उस व्यक्ति से आत्मीय दुर्गन्ध रिसता रहता है । ऐसा साधक घंटों बैठा रहे साधना स्थल पर छोटी सी अनुभूति भी नहीं होती । ऐसे दुर्गन्धित साधकों से संतों को परहेज हो जाता है ।
एक संत का आशीर्वाद रुपी हस्त या वरद हस्त भी प्राप्त नहीं होता । इन बातों को समझ कर जो दुर्गन्ध को मिटा दे वो सच्चा साधक अन्यथा भटकाव अवश्यम्भावी है । 
ऐसे साधक कोई अनुभूति ना होने पर साधना पथ को ही त्याग देते हैं । 

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