अनुभूतियों और इश्वर के आदेशों को जानने का अधिकार स्व के अलावा आत्मा और परमात्मा को ही होता है ।सांसारिक रूप में व्याख्या करना या प्रदर्शन करना उन अनुभूतियों के मार्ग को अवरुद्ध करता है ।
अक्सर देखता हूँ साधक अपने साधना स्थल पर मोबाइल और कैमरा साथ रखते हैं । जैसे साधना के समय देवों के साथ उनको भी जगाते हैं । कोई दृश्य हुआ रिकॉर्ड करने लगे या आवाज आई रिकॉर्ड करने लगे । ईश्वरीय सन्देश दिखा कैमरे में capture कर लिया । कोई ईश्वरीय प्रमाण मिला तो सबको दिखाने या बताने लगे । इन गति विधि से आपके मन में स्वः प्रतिष्ठा तथा अपनी महिमा मंडन के भाव आते हैं । जो साधना पथ से भटकाती है ।
अनुभूतियों के बारे में जानने का अधिकार बस आत्मा-स्वयं और गुरु और परमात्मा को है ।
जिस प्रकार एक मनुष्य अपने सहचरी के संग व्यतीत किये हुए आतंरिक क्षणों को किसी से नहीं बताते और बताने पर सहचरी के क्रोध का भाजन बनना पड़ता है ।उसी प्रकार परमात्मा के संग व्यतीत किया हुआ क्षण भी किसी से नहीं बताना चाहिए ।
अगर आप किसी से गुप्त रूप में वार्ता करें और गुप्त बातें जग जाहिर हो जाये तो आपको क्रोध आना अवश्यम्भावी है ।
अक्सर देखता हूँ साधक अपने साधना स्थल पर मोबाइल और कैमरा साथ रखते हैं । जैसे साधना के समय देवों के साथ उनको भी जगाते हैं । कोई दृश्य हुआ रिकॉर्ड करने लगे या आवाज आई रिकॉर्ड करने लगे । ईश्वरीय सन्देश दिखा कैमरे में capture कर लिया । कोई ईश्वरीय प्रमाण मिला तो सबको दिखाने या बताने लगे । इन गति विधि से आपके मन में स्वः प्रतिष्ठा तथा अपनी महिमा मंडन के भाव आते हैं । जो साधना पथ से भटकाती है ।
अनुभूतियों के बारे में जानने का अधिकार बस आत्मा-स्वयं और गुरु और परमात्मा को है ।
जिस प्रकार एक मनुष्य अपने सहचरी के संग व्यतीत किये हुए आतंरिक क्षणों को किसी से नहीं बताते और बताने पर सहचरी के क्रोध का भाजन बनना पड़ता है ।उसी प्रकार परमात्मा के संग व्यतीत किया हुआ क्षण भी किसी से नहीं बताना चाहिए ।
अगर आप किसी से गुप्त रूप में वार्ता करें और गुप्त बातें जग जाहिर हो जाये तो आपको क्रोध आना अवश्यम्भावी है ।
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