Tuesday, 10 June 2014

समय समाप्त होते ही निकल जाऊंगा

मैं तो नदी की अविरल धारा हूँ बहता रहूँगा ,बिना रुके बिना ठिठके ।
जो मिलेंगे मिलता जाऊंगा जो छूटेंगे छोड़ता जाऊंगा पर बहता जाऊंगा ।
कुछ साथ चलेंगे तो लेकर चलता जाऊंगा ।
कुछ ज्ञान रूपी जल को मिलायेंगे समाहित कर चलता जाऊंगा ।
कुछ ज्ञान रूपी जल को पि लेंगे पिलाता जाऊंगा । 
कुछ गंदगी धोयेंगे धोता जाऊंगा पर बढ़ता जाऊंगा । 
कुछ पत्थर फेंक केे आनंद लेंगे देता जाऊंगा पर बढ़ता जाऊंगा । 
कुछ मेरे बहाव को रोकेंगे तो घूम कर बढ़ता जाऊंगा । 
कुछ की शक्ति अधिक है साधन सक्षम हैं तो रुक जाऊंगा ।
पर समय समाप्त होते ही निकल जाऊंगा पर बढ़ता जाऊंगा ।

अंत में महामाया रुपी महासमुद्र है । जिसमे समाहित हो जाऊंगा । 
स्व मैं मेरा मुझे मुझसे घाव गंदगी एवं सबके दुःख और घृणा को खो जाऊंगा । 
अंत में माँ की गोद में सो जाऊंगा । 
अविरल बढ़ता हुआ अंत में थम कर माँ की गोद में विश्राम कर पाउँगा ।

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