Sunday, 20 April 2014

वैसा प्रभू तब करते है जब जीव उनका हो जाता है ।

आत्मा और परमात्मा के बीच वासना का पर्दा है सो हम भगवान का अनुभव नहीँ कर पाते । जैसे ही यह पर्दा हटेगा प्रभू का दर्शन होगा ।
आत्मा अंदर है और ऊपर है अज्ञान और वासना का पर्दा ।
अज्ञान और वासना के इस आवरण को चीर कर भगवान से मिलना है । सिद्ध गुरु की कृपा , परमात्मा की कृपा से बुद्धिगत वासना दूर होती है। बुद्धि मेँ स्थित काम , कृष्ण मिलन मे बाधक है ।
अज्ञान - वासना - वृत्तियोँ के आवरण का नष्ट होना ही चीर हरण लीला है और आवरण नाश के पश्चात जीवात्मा का प्रभू से मिलन है रासलीला ।
कामवासना नष्ट होने पर ईश्वर के साथ अद्वैत हो जाता है ।
भगवान लौकिक वस्त्रो की नहीँ बल्कि बुद्धिगत अज्ञान , कामवासना की चोरी करते है। श्रीकृष्ण तो सर्वव्यापी हैँ , वे जल मे भी हैँ । वे तो गोपियो से मिले हुए ही थे , किन्तु गोपियाँ अज्ञान और वासना से आवृत्त होने के कारण श्रीकृष्ण का अनुभव नही कर पाती थीँ ।सो उस बुद्धिगत अज्ञान और वासनारुपी वस्त्रोँ को भगवान उठा ले गये । वैसा प्रभू तब करते है जब जीव उनका हो जाता है ।

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