मन ही बनध्न और मुक्ति का कारण
मन के हारे हार है मन के जीते जीत।
मन ही मिलावत राम सौं, मन ही करावत फज़ीत।
जब मन की खटपट मिटे, सब खटपट मिट जाये।
समस्त संसार के प्राणी मन के वश में है।और यदि मन को वश में कर लिया,मन को सही दिशा-निर्देश मिल गया ,तो संसार का नियन्ता भी वश में होने में देर ना लगेगी,यह भी सत्य है।मन ही मदन मोहन से जोड़ सकता है,और मन ही मोह मद में डुबो सकता है।सन्त जनों का कहना कि "मन ही बन्धन और मौक्ष का कारण है"यह अटूट सत्य ही है।लेकिन जिस मन का मानव शरीर में इतना महत्वपूर्ण स्थान है,वह मन आखिरकार है क्या?अपनी क्षुद्र मति से बताने का प्रयास करती हूँ।
पच्चीस महतत्व से निर्मित इस सम्पूर्ण सृष्टि में अनेक विचित्रतायें और वैशिष्टतायें छिपी हुयी हैं।उस पर मानव रूप की निर्मिति तो प्रभु कीअद्भुत रचना है।श्री तुलसीदासजी अपनी रामायण में लिखते हैं-
क्षिति जल पावक गगन समीरा,पंच तत्व यह रचित शरीरा।
फिर अन्तःकरण चतुष्टय के अन्तर्गत- मन, बुद्धि, चित्त,अहंकार आता है।इन सभी में भी सबसे अधिक क्रियान्वित और प्रभावी होता है,तो वह मन है।मन ही के द्वारा किेये गये क्रियाकलापों से पूरा संसार, समाज और व्यक्ति हमेशा सम्बन्धित होता है।मन अत्यन्त चंचल पल मे असीम दूरी लांघने वाला,समस्त ज्ञानों का भण्डार,स्मरण शक्ति का आधार,समस्त ज्ञानों का उत्पादक तथा केन्द है।मन मनुष्यों में जीती जागती ज्योति की तरह से होता है।आप कहीं भी बैठे हुये दूर देशों की यात्रा,और उचित-अनुचित क्रियाओं की कल्पना, इस मन के द्वारा कभी भी कर सकते हैं।ज्ञान-अज्ञान के कारण ही मन से सुख और दुःख का अहसास होता रहता है।तन पर कीमती वस्त्र ना होने पर भी यदि कीमती मन हो तो सब कुछ कीमती हो सकता है।मन को मालिक बनाकर जब हम उस पर संयम,विवेक,ज्ञान की लगाम नहीं लगातें तो इसका परिणाम बड़ा ही कष्टदायक हो जाता है।
ऋषि,सन्त एवं विद्वान जनों का कहना है कि मनुष्य सिर्फ शरीर मात्र नहीं है,वरन् आत्मारूप अविनाशी तत्व है।इस शरीर रूपी रथ का आत्मा स्वामी(रथी) है।बुद्धि ज्ञान कोचवान है।शरीर की दस इन्द्रियां यानि पांच ज्ञानेन्द्रियां(आँख, नाक,कान,जीभ और त्वचा)पांच कर्मेन्द्रियां(वाणी,हाथ,पैर,गुदा और उपस्थ),इस शरीर रूपी रथ के घोड़े हैं।इन्द्रियों के द्वारा भोगे जाने भोग-विलास इनका भोजन हैं (यानि घोड़ो की घास है)।मन इन घोडों रूपी इन्द्रियों की चाल है,गति है और विवेक बुद्धि संयम इनकी लगाम डोरी है,नाना प्रकार के कष्ट चाबुक की तरह से हैं।जब ज्ञानबुद्धि रूपी कोचवान, संयम विवेक रूपी लगाम लगाकर,घोड़ों रूपी इन्द्रियों की मन रूपी चाल पर नियन्त्रण रखकर इस शरीर रूपी रथ पर आत्मा रूपी रथी को चलाता है,तब तो इसके कार्य,क्रियाकलाप अच्छे और मुक्तिदायक होने लगते हैं।अन्यथा इसके विपरीत कोचवान के द्वारा असंयम, अविवेक,से मदहोश होकर लगाम पर से नियन्त्रण खो देने पर,जिस तरह घोड़े बेकाबू होकर इधर-उधर सरपट दौड़ते हुये,खार, खंडहर,गढ्ढों मे गिरते हुये भटक जाते हैं और रथ,रथी सभी को घायल कर विनाश करवा देते हैं।उसी तरह जब मनुष्य ,मन पर से नियन्त्रण खोकर, भोग-विलासों में इन्द्रियों को लिप्त कर देता है,और जब बुद्धि अज्ञान से ग्रसित होकर धर्म- अधर्म उचित-अनुचित,बुरे-भले का विचार छोड़कर दुष्कर्मो के द्वारा अपनी आत्मा को अपवित्र और असंस्कारित करने लगता है,तो परिणाम स्वरूप वर्तमान शरीर की मृत्यु के पश्चात् आत्मा जन्म जन्मान्तरं में नाना प्रकार की योनियों को प्राप्त करके घोर पीड़ा,रोग,शोक तथा दुःख भोगती है।
मन के हारे हार है मन के जीते जीत।
मन ही मिलावत राम सौं, मन ही करावत फज़ीत।
जब मन की खटपट मिटे, सब खटपट मिट जाये।
समस्त संसार के प्राणी मन के वश में है।और यदि मन को वश में कर लिया,मन को सही दिशा-निर्देश मिल गया ,तो संसार का नियन्ता भी वश में होने में देर ना लगेगी,यह भी सत्य है।मन ही मदन मोहन से जोड़ सकता है,और मन ही मोह मद में डुबो सकता है।सन्त जनों का कहना कि "मन ही बन्धन और मौक्ष का कारण है"यह अटूट सत्य ही है।लेकिन जिस मन का मानव शरीर में इतना महत्वपूर्ण स्थान है,वह मन आखिरकार है क्या?अपनी क्षुद्र मति से बताने का प्रयास करती हूँ।
पच्चीस महतत्व से निर्मित इस सम्पूर्ण सृष्टि में अनेक विचित्रतायें और वैशिष्टतायें छिपी हुयी हैं।उस पर मानव रूप की निर्मिति तो प्रभु कीअद्भुत रचना है।श्री तुलसीदासजी अपनी रामायण में लिखते हैं-
क्षिति जल पावक गगन समीरा,पंच तत्व यह रचित शरीरा।
फिर अन्तःकरण चतुष्टय के अन्तर्गत- मन, बुद्धि, चित्त,अहंकार आता है।इन सभी में भी सबसे अधिक क्रियान्वित और प्रभावी होता है,तो वह मन है।मन ही के द्वारा किेये गये क्रियाकलापों से पूरा संसार, समाज और व्यक्ति हमेशा सम्बन्धित होता है।मन अत्यन्त चंचल पल मे असीम दूरी लांघने वाला,समस्त ज्ञानों का भण्डार,स्मरण शक्ति का आधार,समस्त ज्ञानों का उत्पादक तथा केन्द है।मन मनुष्यों में जीती जागती ज्योति की तरह से होता है।आप कहीं भी बैठे हुये दूर देशों की यात्रा,और उचित-अनुचित क्रियाओं की कल्पना, इस मन के द्वारा कभी भी कर सकते हैं।ज्ञान-अज्ञान के कारण ही मन से सुख और दुःख का अहसास होता रहता है।तन पर कीमती वस्त्र ना होने पर भी यदि कीमती मन हो तो सब कुछ कीमती हो सकता है।मन को मालिक बनाकर जब हम उस पर संयम,विवेक,ज्ञान की लगाम नहीं लगातें तो इसका परिणाम बड़ा ही कष्टदायक हो जाता है।
ऋषि,सन्त एवं विद्वान जनों का कहना है कि मनुष्य सिर्फ शरीर मात्र नहीं है,वरन् आत्मारूप अविनाशी तत्व है।इस शरीर रूपी रथ का आत्मा स्वामी(रथी) है।बुद्धि ज्ञान कोचवान है।शरीर की दस इन्द्रियां यानि पांच ज्ञानेन्द्रियां(आँख, नाक,कान,जीभ और त्वचा)पांच कर्मेन्द्रियां(वाणी,हाथ,पैर,गुदा और उपस्थ),इस शरीर रूपी रथ के घोड़े हैं।इन्द्रियों के द्वारा भोगे जाने भोग-विलास इनका भोजन हैं (यानि घोड़ो की घास है)।मन इन घोडों रूपी इन्द्रियों की चाल है,गति है और विवेक बुद्धि संयम इनकी लगाम डोरी है,नाना प्रकार के कष्ट चाबुक की तरह से हैं।जब ज्ञानबुद्धि रूपी कोचवान, संयम विवेक रूपी लगाम लगाकर,घोड़ों रूपी इन्द्रियों की मन रूपी चाल पर नियन्त्रण रखकर इस शरीर रूपी रथ पर आत्मा रूपी रथी को चलाता है,तब तो इसके कार्य,क्रियाकलाप अच्छे और मुक्तिदायक होने लगते हैं।अन्यथा इसके विपरीत कोचवान के द्वारा असंयम, अविवेक,से मदहोश होकर लगाम पर से नियन्त्रण खो देने पर,जिस तरह घोड़े बेकाबू होकर इधर-उधर सरपट दौड़ते हुये,खार, खंडहर,गढ्ढों मे गिरते हुये भटक जाते हैं और रथ,रथी सभी को घायल कर विनाश करवा देते हैं।उसी तरह जब मनुष्य ,मन पर से नियन्त्रण खोकर, भोग-विलासों में इन्द्रियों को लिप्त कर देता है,और जब बुद्धि अज्ञान से ग्रसित होकर धर्म- अधर्म उचित-अनुचित,बुरे-भले का विचार छोड़कर दुष्कर्मो के द्वारा अपनी आत्मा को अपवित्र और असंस्कारित करने लगता है,तो परिणाम स्वरूप वर्तमान शरीर की मृत्यु के पश्चात् आत्मा जन्म जन्मान्तरं में नाना प्रकार की योनियों को प्राप्त करके घोर पीड़ा,रोग,शोक तथा दुःख भोगती है।
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