सच्ची पुकारसे प्रभुकृपा
बात पुरानी है। उन दिनों मैं प्राइमरी पाठशाला, बेरीनागमें चौथी जमातमें पढ़ता था। दस वर्षका मैं और वयोवृद्ध पिताजी, यही मेरा परिवार था। माँ, जब मैं दो मासका था, तभी चल बसी थीं। न कोई भाई और न बहिन थी। मुझे याद है कि उन दिनों मैं भक्त प्रह्लाद, ध्रुण, द्रौपदी और गजेन्द्र आदिकी कथाएँ कवितारुपमें गा-गाकर अपने वृद्ध पिताजीको सुनाया करता था। हृदय पवित्र था। राग-द्वेश, काम-क्रोध, लोभ-मोहादि विकारोंके अस्तित्वकी मुझे तब कल्पना भी नहीं थी। मैं कहता-‘भगवन् ! मैं दुनिया में अकेला हूँ; मेरा कोई नहीं है, तुम हो। मुझे बिसारना नहीं।’ भक्तों के चरित्र गाते-सुनाते मेरी आँखोंसे आँसुओंकी झड़ी लग जाती थी। पाठशाला जाना, घर आना, अपने पिताजीको कथाएँ सुनाना और भक्तोंकी महिमा गा-गाकर सो जाना यही मेरी दिनचर्या थी।
एक दिन, जब मैं पाठशालामें था, मेरे एक चचेरे भाईने पाठशालामें आकर
मुझसे कहा-‘गुरुजीसे छुट्टी ले लो जल्दी घर चलो। तुम्हारे पिताजीको खेतमें एक विषधर सर्पने काट लिया है। पर अब तबियत ठीक है। घबराना नहीं।’
मेरे ऊपर मानो पहाड़ टूट पड़ा। मैंने छुट्टी ली और चला। मेरा बालक-हॄदय किसी अज्ञात आशंका से काँप उठा। मैं भलीभाँति जानता था कि जब सर्प काटता है, मौत निश्चित होती है और समझता था कि जिसकी मौत आती है, उसको सर्प काटता है। मेरी अन्तरात्मा रो उठी और मैं फूट-फूटकर रोते हुए घर चला। भाईने बहुत समझाया कि चिन्ता करनेकी कोई बात नहीं है। पर मेरे पग घरकी ओर चलते ही नहीं थे।
किसी प्रकार घर पहुँचा। पिताजीकी हालत देखते ही कराह उठा। उनका चेहरा नीला पड़ गया था, आँखें अंदरकी ओर धँस गयी थीं, सारे शरीरमें भयंकर सूजन थी। मैं डर गया और बिलखने लगा। पिताजीको होश था, पर बेचैनी थी। उन्होंने कहा-‘ बेटा ! अब मैं क्षणोंका मेहमान हूँ, भगवान् तेरे सहायक हैं। रो मत।’
सायंकाल हुआ, सभी अपने-अपने घरोंकी ओर चल दिये। मेरे चचेरे भाईने कहा-‘देख इन्हें नींद न आने देना; जब सोने लगें, जगा देना। मैं अभी भोजन करके आ जाऊँगा।’ और वे भी चले गये। पिताजीके सामने अकेला मैं बैठा अपनी किस्मतकी निष्ठुरतापर कराह उठा- सामने भगवान् श्रीकृष्ण का चित्र हँस रहा था। मैंने कहा-‘मेरे प्रभो!’ और रो उठा। ‘आप मेरे हैं, मेरी माँ कब आयी और चल दी- इसका मुझे ज्ञानतक नहीं, न कोई साथी और न कोई अपना। एक ये ही अस्थिपञ्जर बूढ़े पिताजी थे, ये भी आज मुझे छोड़कर जा रहे हैं। मैं अभागा इनकी सेवा भी न कर सका। प्रभो ! मेरे पिताजीको बचाओ, मेरी रक्षा करो। आप आशुतोष भगवान् शंकरके सखा हैं। भगवान् शंकरका एक गण, सर्प मेरे पिताजीको काट गया है। प्रभो ! अपने सखातक मेरी यह सिफारिश पहुँचा दो कि उनका सर्पराज अपने विषकी अग्निको मेरे पिताजीके शरीरसे शान्तकर इन्हें स्वस्थ कर दे। प्रभो ! मेरी विनय सुनो।’ प्रार्थना करते-करते मेरा गला भर आया और मैं विलख-विलखकर रोने लगा। इतनेमें मैंने देखा एक भयंकर सर्प मेरे पिताजीके हाथपर डंक मारकर अन्तर्धान हो गया है।
मेरा रोना सुनकर पास-पड़ोससे सभी लोग आ गये और मेरे चचेरे भाई भी तबतक पहुँच गये। उन्होंने देखा कि मेरे पिताजीको नींद आ गयी। वे काँप उठे। उन्होंने कहा- ‘ सर्वनाश हो गया है’ मुझे अपनी सुध न थी।
भाईने काँपते हुए पिताजीको हिलाया। हमारे आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब वे ऐसे उठ बैठे जैसे गहरी निद्राके पश्चात् कोई उठता है और बोले -‘अब मैं ठीक हूँ’ बेचैनी नहीं है। तुमलोग सो जाओ।’ हम सभी एक-दूसरेके मुँहको देखने लगे। मैंने अपने प्रभुको प्रणाम किया और इस दिव्य चमत्कारका किसीको पता न लगा।
वे दिन भी थे और आज भी हैं। आज मेरे परिवारमें वृद्धि हो गयी है। पिताजी अभी भी जीवित हैं और हमलोगोंकी देख-रेख करते हैं। आज भी मैं प्रार्थना करता हूँ, प्रात:-सायं भजन गाता हूँ, पर उन दिनोंमें और आजमें आकाश-पाताल का अन्तर है। आज हृदयमें काम है, क्रोध की भयंकर अग्नि है और राग-द्वेशसे हृदयका कोना-कोना भर गया है। और न मालूम क्या-क्या है। आजकी मेरी प्रार्थना हृदयसे नहीं, पर केवल मुँहसे होती है। भगवान् मेरे अपने नहीं प्रत्युत पराये हो गये हैं। मैं आज अपने बीबी-बच्चोंको ही अपना समझने लगता हूँ। ऐसी स्थितिमें भगवान् मेरी सुने, यह कोरी कल्पना है।
मुझे निश्चय है और सोलहों आने निश्चय है कि प्रभुके कानों तक वही पुकार पहुँच सकती है, जो सच्चे -निष्कपट हॄदयसे, अन्तरात्मासे निकलती है और वह पहुँचती है अवश्य, भले ही हम उस पुकारको स्वार्थसे करें अथवा परमार्थबुद्धिसे। इससे हमारा ही सम्बन्ध है, भगवान् का नहीं। वे सुनते हैं और सुनेंगे। बस, विश्वासी सुनानेवालोंकी आवश्यकता है।
बात पुरानी है। उन दिनों मैं प्राइमरी पाठशाला, बेरीनागमें चौथी जमातमें पढ़ता था। दस वर्षका मैं और वयोवृद्ध पिताजी, यही मेरा परिवार था। माँ, जब मैं दो मासका था, तभी चल बसी थीं। न कोई भाई और न बहिन थी। मुझे याद है कि उन दिनों मैं भक्त प्रह्लाद, ध्रुण, द्रौपदी और गजेन्द्र आदिकी कथाएँ कवितारुपमें गा-गाकर अपने वृद्ध पिताजीको सुनाया करता था। हृदय पवित्र था। राग-द्वेश, काम-क्रोध, लोभ-मोहादि विकारोंके अस्तित्वकी मुझे तब कल्पना भी नहीं थी। मैं कहता-‘भगवन् ! मैं दुनिया में अकेला हूँ; मेरा कोई नहीं है, तुम हो। मुझे बिसारना नहीं।’ भक्तों के चरित्र गाते-सुनाते मेरी आँखोंसे आँसुओंकी झड़ी लग जाती थी। पाठशाला जाना, घर आना, अपने पिताजीको कथाएँ सुनाना और भक्तोंकी महिमा गा-गाकर सो जाना यही मेरी दिनचर्या थी।
एक दिन, जब मैं पाठशालामें था, मेरे एक चचेरे भाईने पाठशालामें आकर
मुझसे कहा-‘गुरुजीसे छुट्टी ले लो जल्दी घर चलो। तुम्हारे पिताजीको खेतमें एक विषधर सर्पने काट लिया है। पर अब तबियत ठीक है। घबराना नहीं।’
मेरे ऊपर मानो पहाड़ टूट पड़ा। मैंने छुट्टी ली और चला। मेरा बालक-हॄदय किसी अज्ञात आशंका से काँप उठा। मैं भलीभाँति जानता था कि जब सर्प काटता है, मौत निश्चित होती है और समझता था कि जिसकी मौत आती है, उसको सर्प काटता है। मेरी अन्तरात्मा रो उठी और मैं फूट-फूटकर रोते हुए घर चला। भाईने बहुत समझाया कि चिन्ता करनेकी कोई बात नहीं है। पर मेरे पग घरकी ओर चलते ही नहीं थे।
किसी प्रकार घर पहुँचा। पिताजीकी हालत देखते ही कराह उठा। उनका चेहरा नीला पड़ गया था, आँखें अंदरकी ओर धँस गयी थीं, सारे शरीरमें भयंकर सूजन थी। मैं डर गया और बिलखने लगा। पिताजीको होश था, पर बेचैनी थी। उन्होंने कहा-‘ बेटा ! अब मैं क्षणोंका मेहमान हूँ, भगवान् तेरे सहायक हैं। रो मत।’
सायंकाल हुआ, सभी अपने-अपने घरोंकी ओर चल दिये। मेरे चचेरे भाईने कहा-‘देख इन्हें नींद न आने देना; जब सोने लगें, जगा देना। मैं अभी भोजन करके आ जाऊँगा।’ और वे भी चले गये। पिताजीके सामने अकेला मैं बैठा अपनी किस्मतकी निष्ठुरतापर कराह उठा- सामने भगवान् श्रीकृष्ण का चित्र हँस रहा था। मैंने कहा-‘मेरे प्रभो!’ और रो उठा। ‘आप मेरे हैं, मेरी माँ कब आयी और चल दी- इसका मुझे ज्ञानतक नहीं, न कोई साथी और न कोई अपना। एक ये ही अस्थिपञ्जर बूढ़े पिताजी थे, ये भी आज मुझे छोड़कर जा रहे हैं। मैं अभागा इनकी सेवा भी न कर सका। प्रभो ! मेरे पिताजीको बचाओ, मेरी रक्षा करो। आप आशुतोष भगवान् शंकरके सखा हैं। भगवान् शंकरका एक गण, सर्प मेरे पिताजीको काट गया है। प्रभो ! अपने सखातक मेरी यह सिफारिश पहुँचा दो कि उनका सर्पराज अपने विषकी अग्निको मेरे पिताजीके शरीरसे शान्तकर इन्हें स्वस्थ कर दे। प्रभो ! मेरी विनय सुनो।’ प्रार्थना करते-करते मेरा गला भर आया और मैं विलख-विलखकर रोने लगा। इतनेमें मैंने देखा एक भयंकर सर्प मेरे पिताजीके हाथपर डंक मारकर अन्तर्धान हो गया है।
मेरा रोना सुनकर पास-पड़ोससे सभी लोग आ गये और मेरे चचेरे भाई भी तबतक पहुँच गये। उन्होंने देखा कि मेरे पिताजीको नींद आ गयी। वे काँप उठे। उन्होंने कहा- ‘ सर्वनाश हो गया है’ मुझे अपनी सुध न थी।
भाईने काँपते हुए पिताजीको हिलाया। हमारे आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब वे ऐसे उठ बैठे जैसे गहरी निद्राके पश्चात् कोई उठता है और बोले -‘अब मैं ठीक हूँ’ बेचैनी नहीं है। तुमलोग सो जाओ।’ हम सभी एक-दूसरेके मुँहको देखने लगे। मैंने अपने प्रभुको प्रणाम किया और इस दिव्य चमत्कारका किसीको पता न लगा।
वे दिन भी थे और आज भी हैं। आज मेरे परिवारमें वृद्धि हो गयी है। पिताजी अभी भी जीवित हैं और हमलोगोंकी देख-रेख करते हैं। आज भी मैं प्रार्थना करता हूँ, प्रात:-सायं भजन गाता हूँ, पर उन दिनोंमें और आजमें आकाश-पाताल का अन्तर है। आज हृदयमें काम है, क्रोध की भयंकर अग्नि है और राग-द्वेशसे हृदयका कोना-कोना भर गया है। और न मालूम क्या-क्या है। आजकी मेरी प्रार्थना हृदयसे नहीं, पर केवल मुँहसे होती है। भगवान् मेरे अपने नहीं प्रत्युत पराये हो गये हैं। मैं आज अपने बीबी-बच्चोंको ही अपना समझने लगता हूँ। ऐसी स्थितिमें भगवान् मेरी सुने, यह कोरी कल्पना है।
मुझे निश्चय है और सोलहों आने निश्चय है कि प्रभुके कानों तक वही पुकार पहुँच सकती है, जो सच्चे -निष्कपट हॄदयसे, अन्तरात्मासे निकलती है और वह पहुँचती है अवश्य, भले ही हम उस पुकारको स्वार्थसे करें अथवा परमार्थबुद्धिसे। इससे हमारा ही सम्बन्ध है, भगवान् का नहीं। वे सुनते हैं और सुनेंगे। बस, विश्वासी सुनानेवालोंकी आवश्यकता है।
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