Monday, 21 April 2014

मेरा चित्त निरन्तर आप में ही लगा रहे

द्वापर के वन में चक्रिक नामक एक भील
रहता था !

भील होने पर भी वह सच्चा मधुर-
भाषी दयालु प्राणियों की हिंसा से विमुख
क्रोध-रहित और माता-
पिता की सेवा करने वाला था !उसने न
विद्या पढ़ी थी न शास्त्र सुने थे किन्तु
था वह भगवान् का भक्त !केशव माधव
गोविन्द आदि भगवान के पावन
नामों का वह बराबर स्मरण
किया करता था !

वन में एक पुराना मंदिर था उसमें भगवान
की मुर्ति थी !सरल हृदय चक्रिक को जब
भी कोई अच्छा फल वन में मिलता तब वह
उसे चखकर देखता ;यदि फल स्वादिष्ट
लगता तो लाकर भगवान को चढ़ा देता और
मीठा न होता तो स्वयं खा लेता !भगवान
को जूठे फल नहीं चढाने चाहिये यह बात
उसको पता नहीं थी !

एक दिन वन में चक्रिक को पियाल वृक्ष पर
एक पका फल मिला !फल तोड़कर उसने स्वाद
जानने के लिये उसे मुख में डाला ;फल बहुत
स्वादिष्ट था पर मुख में रखते ही वह गले में
सरक गया !सबसे अच्छी वस्तु भगवान
को देनी चाहिये यह चक्रिक
की मान्यता थी !एक स्वादिष्ट फल उसे आज
मिला वह तो भगवान का था ;भगवान के
हिस्से का फल वह स्वयं खा ले यह तो बड़े
दुःख की बात थी !
अतः दाहिने हाथ से उसने अपना गला उसने
दबाया जिससे फल पेट में न चला जाय और
मुख में अँगुली डालकर वमन किया पर फिर
भी फल निकला नही !चक्रिक का सरल
ह्रदय भगवान को देने योग्य फल स्वयं
खा लेने पर किसी प्रकार प्रस्तुत
नहीं था अतः वह भगवान की मूर्ति के पास
गया और कुल्हाड़ी से गला काटकर उसने फल
निकालकर तो भगवान को अर्पण कर
दिया !

अत्याधिक पीड़ा के कारण वह गिर
पड़ा ;सरल भक्त की निष्ठां से सर्वेश्वर
जगन्नाथ रीझ गये !श्री हरि चतुर्भुज-रूप से
वही प्रकट हो गये और मन ही मन कहने लगे
-इस भक्तिमान भील ने जैसा सात्विक कर्म
किया है मेरे पास ऐसी कौन-सी वस्तु है
जिसे देकर मैं इसके ऋण से छूट सकूँ ?
ब्रह्मा का पद शिव का पद या विष्णु
का पद भी दे दूँ तो भी इस भक्त के ऋण से मैं
मुक्त नहीं हो सकता !
फिर भक्तवत्सल प्रभु ने चक्रिक के मस्तक
पर अपना अभय करकमल रख दिया !भगवान
के कर-स्पर्श पाते ही चक्रिक का घाव मिट
गया एवं उसकी पीड़ा चली गयी ;वह
तत्काल स्वस्थ होकर उठ बैठा !देवाधिदेव
नारायण ने अपने पीताम्बर से उसके शरीर
की धूलि इस प्रकार झाड़ी जैसे पिता पुत्र
के शरीर की धूलि झाड़ता है !

भगवान को सामने देख चक्रिक ने गदगद
होकर दोनों हाथ जोड़कर सरल भाव से
स्तुति की -हे केशव हे गोविन्द हे जगदीश मैं
मूर्ख भील हूँ !मुझे
आपकी प्राथना भी करनी नहीं आती इसलिये
मुझे क्षमा करो !मेरे स्वामी मुझ पर प्रसन्न
हो जाओ आपकी पूजा छोड़कर जो लोग दूसरे
की पूजा करते हैं वे महामूर्ख हैं !भगवान ने
वरदान माँगने को कहा ;तो चक्रिक ने
कहा -हे कृपामय जब मैंने आपके दर्शन कर
लिये है तब अब और क्या पाना रह गया ?
मुझे अब किसी अन्य वरदान
की आवश्यकता नहीं बस मेरा चित्त
निरन्तर आप में ही लगा रहे
ऐसी अनुकम्पा कीजियेगा !

भगवान ने मुस्करा कर कहा -एवमस्तु !इस
प्रकार उस भील को भक्ति का वरदान
देकर भगवान अंतर्ध्यान हो गये !चक्रिक
वहा से द्वारका चला आया और जीवन भर
भगवद्भजन में लगा रहा !

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